अर्थव्यवस्था

पश्चिम एशिया संकट से मौद्रिक नीति में सख्ती का संकेत, बढ़ सकती है रीपो रेट

प​श्चिम ए​शिया में टकराव के बीच ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप दरों में तेजी

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अंजलि कुमारी   
Last Updated- March 16, 2026 | 11:05 PM IST

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के चलते इस महीने ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप (ओआईएस) दरें तेजी से बढ़ी हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार के भागीदार अब इस संभावना को ध्यान में रखकर कीमतें तय करना शुरू कर रहे हैं कि ‘लंबे समय तक कम दरें’ रहने का दौर अब खत्म हो सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो मौद्रिक नीति सख्त हो सकती है।

बाजार के जानकारों के मुताबिक एक साल की ओआईएस दर अब इस साल कम से कम दो बार नीतिगत दर में बढ़ोतरी की संभावना को दर्शा रही है। ये बढ़ोतरी अगस्त से शुरू हो सकती है और रीपो में दोनों बार 25-25 आधार अंक का इजाफा हो सकता है। प​श्चिम ए​शिया में टकराव शुरू होने से लेकर अभी तक एक साल की ओआईएस दर में 36 आधार अंक की तेजी आई है।

पिछले हफ्ते यह 23 आधार अंक बढ़कर 5.84 फीसदी हो गई। इसी दौरान 5 साल की ओआईएस दर 17 आधार अंक बढ़कर 6.39 फीसदी हो गई। आज एक साल की ओआईएस दर स्थिर रही जबकि 5 साल की दर 4 आधार अंक बढ़कर 6.43 फीसदी पर बंद हुई।

ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (ओआईएस) अनुबंध में दो पक्ष एक निश्चित दर को, ओवरनाइट मुंबई इंटरबैंक ऑफर्ड रेट (माइबोर) से जुड़ी एक परिवर्तनशील दर के साथ बदलते हैं। ओआईएस दरें नकदी की स्थितियों या सरकारी बॉन्ड की आपूर्ति से काफी हद तक अलग रहती हैं इसलिए वे मुख्य रूप से भविष्य की मौद्रिक नीति से जुड़ी कार्रवाइयों की संभावनाओं को दर्शाती हैं। ओआईएस दर में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि बाजार को आगे चलकर नीतिगत दर में बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एक प्राइमरी डीलरशिप के डीलर ने कहा, ‘ओआईएस कर्व पहले से ही कुछ दर बढ़ोतरी का संकेत दे रहा है। बाजार अगस्त से कम से कम दो दफे 25-25 आधार अंक की बढ़ोतरी को ध्यान में रख रहा है। माना जा रहा है कि अगर संघर्ष जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो इससे महंगाई बढ़ सकती है और केंद्रीय बैंक को अपनी नीति सख्त करनी पड़ सकती है।’

बाजार के जानकारों का कहना है कि विदेशी निवेशक स्वैप बाजार में भुगतान पक्ष की ओर काफी सक्रिय रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई को बढ़ा सकती हैं और चालू खाते का घाटा तथा राजकोषीय घाटा जैसे व्यापक आर्थिक असंतुलन को और गहरा कर सकती हैं।

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि ओआईएस दरों में बढ़ोतरी मोटे तौर पर बाजार के इस आकलन को दिखाती है कि दरों में नरमी का दौर शायद खत्म हो गया है। कारोबारियों का कहना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव कम भी हो जाता है तब भी कच्चे तेल की कीमतें संघर्ष-पूर्व के स्तर से काफी ऊपर बनी रह सकती हैं, जिससे महंगाई का दबाव बना रह सकता है और भविष्य में नीति सख्त हो सकती है।

अब सभी की नजरें 6 से 8 अप्रैल को होने वाली मौद्रिक नीति की अगली समीक्षा पर टिकी हैं। इससे शायद कुछ संकेत मिल पाएगा कि आगे ब्याज दरें कैसी रहेंगी।

First Published : March 16, 2026 | 11:02 PM IST