अर्थव्यवस्था

West Asia War: पश्चिम एशिया युद्ध से भारत की अर्थव्यवस्था पर खतरा? सरकार ने जताई लंबी अनिश्चितता की आशंका

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और तेल कीमतों में उछाल से भारत की अर्थव्यवस्था पर महंगाई, रुपये और व्यापार के मोर्चे पर दबाव बढ़ने की आशंका सरकार ने जताई है।

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रुचिका चित्रवंशी   
Last Updated- March 07, 2026 | 12:05 PM IST

पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर केंद्र सरकार ने चिंता जताई है। वित्त मंत्रालय ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा है कि अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर हमले के बाद क्षेत्र में पैदा हुआ संघर्ष लंबे समय तक असर डाल सकता है। मंत्रालय का मानना है कि इस संकट के प्रभाव तुरंत पूरी तरह स्पष्ट नहीं होंगे, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक महसूस किए जा सकते हैं।

अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर पड़ सकता है असर

वित्त मंत्रालय के अनुसार अगर पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसमें महंगाई दर, रुपये की विनिमय दर, व्यापार, पूंजी प्रवाह, भुगतान संतुलन और चालू खाता घाटा जैसे अहम संकेतक शामिल हैं।

मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। इससे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ेगा।

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उर्वरक और पेट्रोकेमिकल सेक्टर पर भी दबाव

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि उर्वरक और पेट्रोकेमिकल जैसे क्षेत्र इस संकट से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। इन उद्योगों की बड़ी निर्भरता एलएनजी और कच्चे तेल पर होती है। रिपोर्ट के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से एलएनजी की कीमतों में करीब 9 प्रतिशत और कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर कृषि और औद्योगिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

1991 के खाड़ी युद्ध जैसी स्थिति की तुलना

आर्थिक मामलों के विभाग के अधिकारियों द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या के बाद स्थिति तेजी से बदली है। इसे 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान आए तेल संकट जैसी एक महत्वपूर्ण भू राजनीतिक घटना बताया गया है, जो आने वाले दशकों तक वैश्विक ऊर्जा राजनीति को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत आज 1991 की तुलना में बेहतर आर्थिक स्थिति में है और उसके पास मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक आधार मौजूद है।

100 डॉलर से ऊपर तेल की कीमत बनी तो बढ़ेगा दबाव

रिपोर्ट के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव तब दिखाई दे सकता है जब कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है। फिलहाल कई अनिश्चितताएं मौजूद हैं और भविष्य के हालात का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है।

अधिकारियों ने कहा कि केवल कच्चे तेल की कीमत ही नहीं बल्कि प्राकृतिक गैस और रसोई गैस की आपूर्ति भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी बेहद जरूरी है, क्योंकि यही मार्ग भारत के निर्यात और पूंजी प्रवाह के लिए अहम भूमिका निभाते हैं।

भुगतान संतुलन और रुपये पर पड़ सकता है दबाव

आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि फिलहाल जोखिम पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, लेकिन भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका है। अगर संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे रुपये की विनिमय दर पर दबाव पड़ सकता है और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। इसके अलावा महंगाई में भी बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है।

पूंजी प्रवाह में कमी और निवेशकों के सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करने से भारतीय मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

भारत के पास मजबूत आर्थिक आधार

वित्त मंत्रालय का मानना है कि भारत के पास इस तरह के वैश्विक संकट से निपटने के लिए कई मजबूत आर्थिक आधार मौजूद हैं। देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है, चालू खाता घाटा नियंत्रित स्तर पर है और महंगाई भी फिलहाल संतुलित दायरे में बनी हुई है।

इन कारकों की वजह से भारत बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों के प्रभाव को कुछ हद तक नियंत्रित करने और घरेलू ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने में सक्षम है।

प्राकृतिक संसाधनों के भंडार की जरूरत

आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में पैदा हुआ यह संकट भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के सुरक्षित भंडार की आवश्यकता को फिर से रेखांकित करता है। आने वाले वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों को अपने वित्तीय संसाधनों का पुनः प्राथमिकता निर्धारण करना पड़ सकता है।

व्यापार और निवेश में अनिश्चितता बनी रहेगी

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर व्यापार नीतियों को लेकर अनिश्चितता 2026 तक बनी रह सकती है। कई देशों की घरेलू नीतियों और टैरिफ में बार बार हो रहे बदलाव निवेश और व्यापार योजनाओं को प्रभावित कर रहे हैं।

जनवरी 2026 में व्यापार नीति अनिश्चितता सूचकांक में करीब 33.2 प्रतिशत की मासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह संकेत देती है कि वैश्विक व्यापार माहौल अभी भी अस्थिर बना हुआ है।

भविष्य को लेकर बनी रहेगी अनिश्चितता

रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक आर्थिक हालात, व्यापार की स्थिति, वस्तुओं की कीमतों में उतार चढ़ाव और भू राजनीतिक घटनाएं आने वाले समय में भी आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित करती रहेंगी।

हालांकि सरकार का मानना है कि मजबूत आर्थिक आधार और जारी आर्थिक सुधारों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था भविष्य में भी विकास की दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता रखती है। आर्थिक समीक्षा में यह भी अनुमान जताया गया है कि मौजूदा रुझानों को देखते हुए भारत वित्त वर्ष 2028 तक दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

First Published : March 7, 2026 | 12:04 PM IST