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कुछ समय तक बाजार से दूर रह सकते हैं एफआईआई

Last Updated- December 11, 2022 | 8:16 PM IST

बीएस बातचीत
बाजार ने भूराजनीतिक हालात को देखते हुए सतर्कता के साथ वित्त वर्ष 2023 में प्रवेश किया है। जूलियस बेयर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी आशिष गुमाश्ता ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार मेंकहा कि यदि मौजूदा भूराजनीतिक परिदृश्य जल्द बदलता है और कॉरपोरेट आय में करीब 15 प्रतिशत की संभावित वृद्घि दर्ज की जाती है तो उन्हें भारतीय इक्विटी द्वारा वित्त वर्ष 2023 में 15 फीसदी प्रतिफल दिए जाने की संभावना है। मुख्य अंश:
क्या आप मानते हैं कि भारतीय इक्विटी मध्यावधि के नजरिये से विपरीत दांव हैं, क्योंकि भूराजनीतिक हालात और तेल कीमतों पर निराशाजनक स्थिति बनी हुई है?
भारतीय शेयर शेष एशिया-प्रशांत क्षेत्र के मुकाबले महंगे हैं। विपरीत रणनीति उस वक्त मददगार साबित होती है जब मूल्यांकन सस्ता हो। मौजूदा बाजार अब शेयर चयन-आधारित होने जा रहा है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में हमने जो रुझान दर्ज किया है जो शायद अभी कुछ और वक्त तक बना रह सकता है। भारतीय इक्विटी पर समग्र नजरिया कायम है और उसे आर्थिक वृद्घि तथा आय की रफ्तार पर सकारात्मक परिदृश्य से मदद मिली है।

वित्त वर्ष 2023 में परिसंपत्ति वर्ग के तौर पर इक्विटी से आपको प्रतिफल संबंधी उम्मीदें क्या हैं?
ऐतिहासिक तौर पर इक्विटी मुद्रास्फीति को मात देने के लिहाज से श्रेष्ठ परिसंपत्ति वर्ग माना जाता रहा है। यदि भूराजनीतिक परिदृश्य लंबा नहीं खिंचता है और कॉरपोरेट आय में करीब 15 प्रतिशत की संभावित वृद्घि और पिछले 6 महीनों के मुकाबले बाजार में कुछ कीमत-समय आधारित गिरावट दर्ज की जाती है तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारतीय इक्विटी वित्त वर्ष 2023 में लगभग 15 प्रतिशत का प्रतिफल दे सकते हैं।

क्या आप मानते हैं कि वित्त वर्ष 2023 में सकारात्मक बदलावों के मुकाबले बाजारों में समस्याएं ज्यादा हैं?
बाजारों के लिए दो मुख्य समस्याएं लगातार मुद्रास्फीतिकारी दबाव और वैश्विक केंद्रीय बैंकों, खासकर अमेरिकी फेडरल द्वारा सख्ती बरतना है। बाजारों में इनसे संबंधित बढ़ते समाचार प्रवाह का असर पड़ा और इन चुनौतियों में नरमी से संपूर्ण धारणा में सुधार को बढ़ावा मिल सकता है। दूसरी तरफ, मौजूदा भूराजनीतिक स्थिति की लंबी अवधि और ऊंची जिंस कीमतों से धीरे धीरे मांग में कमी और आर्थिक वृद्घि पर दबाव आना शुरू हो सकता है।

भारत पर आपका नजरिया?
हमारा वैश्विक नजरिया मौजूदा समय में सेंसेक्स के लिए 66,000 के लक्ष्य के साथ ‘ओवरवेट’ रेटिंग पर कायम है और इसके कारणों में देश के वृहद आर्थिक स्थायित्व, मजबूत आर्थिक रफ्तार, कंपनियों द्वारा नई तकनीकों को अपनाना आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। हालांकि मुद्रास्फीतिकारी दबाव को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं, लेकिन आय वृद्घि से जुड़े जोखिम सीमित होते दिख रहे हैं।

क्या वैश्विक केंद्रीय बैंक द्वारा दरों में वृद्घि को लेकर आशंका और मंदी से चुड़ी चिंताओं का मौजूदा स्तरों पर असर पूरी तरह से दिख चुका है?
कई वैश्विक केंद्रीय बैंकों को वृद्घि और मुद्रास्फीति के मोर्चे पर चुनौतियां दूर करने के लिए सही संतुलन बिठाना होगा। जहां अमेरिकी फेड द्वारा शुरुआती कदम पूर्व योजना के मुकाबले कम सख्त था, लेकिन बाद में सख्ती ज्यादा बरती गई। इसलिए बाजारों की नजर अमेरिकी फेड के कदम पर लगी रहेगी, क्योंकि इसका इक्विटी और निर्धारित आय दोनों पर असर पड़ेगा। भारत में आरबीआई ने नीतिगत रुख के संदर्भ में काफी हद तक सहयोगात्मक रुख अपनाया है।

क्या एफआईआई की बिकवाली का दौर समाप्त हो गया है?
एफआईआई अभी कुछ और समय तक बाजार से दूर बने रह सकते हैं। लेकिन हमें समस्याएं कम होने पर फिर से पूंजी प्रवाह बढऩे की संभावना है और 2022 की दूसरी छमाही में यह सुधार देखा जा सकता है। भारत की विकास संबंधित स्थिति मजबूत बनी हुई है और निर्माण के प्रति लौटने का सरकार का थीम रोजगार पैदा करेगा और साथ ही आयात पर निर्भरता घटाएगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

क्या बाजार मूल्यांकन सहज है?
बाजार मूल्यांकन अभी भी अपने ऐतिहासिक औसत के मुकाबले थोड़ा महंगा है। लेकिन यह सहज स्तर पर है।

First Published - April 3, 2022 | 11:11 PM IST

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