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अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को मिलेगी रफ्तार!

Last Updated- December 11, 2022 | 4:06 PM IST

इस महीने की शुरुआत में अर्थ आब्जर्वेशन सैटेलाइट (ईओएस2) तथा आजादीसैट (देश भर के 750 ग्रामीण छात्रों द्वारा निर्मित सूक्ष्म उपग्रह) को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए भारत के लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) की पहली उड़ान हालांकि विफल रही है, लेकिन यह परियोजना वैश्विक उपग्रह बाजार में भारत के भविष्य का निर्धारण करने में मुख्य भूमिका अदा करने वाली साबित होने की संभावना है।
वर्तमान में पृथ्वी की कक्षा में मानव निर्मित करीब 4,550  उपग्रह हैं, जिनमें 3,790 निचली कक्षा में, 139 मध्य कक्षा में, 56 उच्च अंडाकार कक्षा में और 565 भूस्थैतिक कक्षा में हैं। अगर दुनिया के दिग्गजों की मौजूदा उपग्रह योजनाएं सच साबित होती हैं, तो 10 साल के भीतर अन्य 50,000 उपग्रह प्रक्षेपित किए जाने की संभावना है। अंतरिक्ष में बढ़ती यह दिलचस्पी ही, भारत के एसएसएलवी को प्रासंगिक बना रही है।
सरकारी अनुमानों के आधार पर 360 अरब डॉलर की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी करीब दो प्रतिशत है। विशेषज्ञों का कहना है कि एसएसएलवी के साथ इसमें 10 प्रतिशत से अधिक का इजाफा किया जा सकता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) पहले ही कह चुका है कि वह जल्द ही एसएसएलवी-डी2 ला सकता है।
केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन के वैज्ञानिक सलाहकार और इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के पूर्व निदेशक एम सी दातन कहते हैं, ‘एसएसएलवी का फायदा उपग्रहों के व्यवसायीकरण से संबंधित है।’ उनका कहना है कि प्रक्षेपण स्थल या यान नहीं रखने वाले ऐसे बहुत से देश हैं, जो प्रौद्योगिकी, रिमोट सेंसिंग और संचार जैसे विभिन्न सामाजिक उद्देश्यों के लिए उपग्रह प्रक्षेपण के वास्ते अन्य देशों पर निर्भर रहते हैं।
56 करोड़ रुपये का एसएसएलवी रॉकेट तकरीबन 500 किलोग्राम वजन के उपग्रह ले जा सकता है। अब तक सरकार एसएसएलवी के विकास के चरण में तीन इकाइयों के लिए 169 करोड़ रुपये स्वीकृत कर चुकी है। दातन ने कहा ‘हमें पीएसएलवी (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) के लिए अच्छे ऑर्डर मिले हैं, क्योंकि यह तुलनात्मक रूप से कम खर्चीला और भरोसेमंद था। अब भी कई ऑर्डर बचे हुए हैं। एसएसएलवी के जरिये यह लागत तकरीबन 60 प्रतिशत तक कम हो जाती है।’
 
पहला अभियान क्यों हुआ नाकाम
यह पहली बार नहीं है कि जब इसरो छोटे प्रक्षेपण वाहनों पर बड़ा दांव लगा रहा है। 1980 के दशक में इसने संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (एएसएलवी) के साथ अपनी किस्मत आजमाने का प्रयास किया था, लेकिन यह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
दातन जैसे विशेषज्ञों का तर्क है कि हालिया प्रक्षेपण 90 प्रतिशत से अधिक सफल रहा, क्योंकि रॉकेट ने उम्मीद के मुताबिक काम किया, सभी चरण सफल रहे और सभी प्रणोदन प्रणालियों ने काम किया। एकमात्र दिक्कत सेंसर विफल रहने की थी, कंप्यूटर ने साफ किया कि कुछ अनियमितता की वजह से एक्सेलेरोमीटर विफल हो गया था। इस कारण प्रणाली ने क्षति से बचने का विकल्प चुना, जो उपग्रहों को गलत कक्षा में ले गया। बाद में एक बयान में इसरो ने कहा कि एसएसएलवी-डी1 ने उपग्रहों को 356 किलोमीटर की गोलाकार कक्षा के बजाय 356 गुना 76 किलोमीटर की अंडाकार कक्षा में स्थापित कर दिया था। इस दिक्कत की भलीभांति रूप से पहचान कर ली गई है। इसमें कहा गया है कि किसी सेंसर की विफलता जानने के लिए लॉजिक की नाकामी के कारण क्षति से बचने वाली कार्रवाई हुई।
पूरी तरह से अंतरिक्ष पर केंद्रित देश के पहले स्टार्टअप ध्रुव स्पेस के संस्थापक संजय नेकांति कहते हैं कि छोटे उपग्रहों के लिए किफायती और समर्पित प्रक्षेपण यान की जरूरत है। यह यान 500 किलोग्राम वजन का उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जा सकता है। इन उपग्रहों का वजन एक किलोग्राम तक जितना कम या 100 किलो जितना अधिक हो सकता है। इसलिए अनिवार्य रूप से इस यान में एक बार में 50 या इससे भी अधिक छोटे उपग्रह प्रक्षेपित करने की क्षमता होती है। उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि एसएसएलवी में ठोस प्रणोदकों का इस्तेमाल करने से एक फायदा होता है, क्योंकि इसकी वजह से लागत में कमी आएगी।
 
भारत की स्थिति
वर्ष 1999 से इसरो की व्यावसायिक शाखाएं ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) का इस्तेमाल करते हुए 34 देशों के उपग्र्रह प्रक्षेपण से 5.6 करोड़ डॉलर और 19 करोड़ यूरो की विदेशी मुद्रा अर्जित कर चुकी है। सरकारी अनुमान के अनुसार इसमें से करीब 3.5 करोड़ डॉलर और एक करोड़ यूरो वर्ष 2019 और वर्ष 2021 के बीच अर्जित किए गए थे। पीएसएलवी अब तक 342 विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है।
ड्यूसॉफ्ट के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि पृथ्वी की कक्षा में 4,550 सक्रिय उपग्रहों में से 2,804 अमेरिकी मूल के हैं और इसके बाद चीन (467), ब्रिटेन (349), रूस (168), जापान (93) और भारत (61) का स्थान आता है। इसलिए भविष्य में इस खंड में भारत के बढ़ने की संभावना काफी अधिक होने की उम्मीद है।
युवा वैज्ञानिकों को तैयार करने के लिए समर्पित चेन्नई स्थित संगठन स्पेस किड्ज इंडिया की मुख्य कार्याधिकारी और संस्थापक श्रीमती केशन कहती हैं ‘एसएसएलवी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अब और ज्यादा देश अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिए सस्ते विकल्प तलाश रह हैं। भले ही पीएसएलवी का पहला प्रयास विफल रहा हो, लेकिन यह सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बन गया है। एसएसएलवी के लिए टर्नअराउंड टाइम कुछ सप्ताह का है।’ स्पेस किड्ज ने ही आजादीसैट परियोजना का इंतजाम किया था, जो एसएसएलवी की पहली शुरुआत थी।
 

First Published - August 31, 2022 | 11:01 PM IST

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