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बाजारों ने अर्थव्यवस्था में सुधार की राह को कमतर आंका

Last Updated- December 11, 2022 | 9:17 PM IST

बीएस बातचीत
कई समस्याओं को देखते हुए बाजारों के लिए ऊंचे स्तरों को बरकरार रखना मुश्किल हो गया है। क्रेडिट सुइस वेल्थ मैनेजमेंट में इंडिया इक्विटी रिसर्च के प्रमुख जितेंद्र गोहिल ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में बताया कि उनके विश्लेषण के आधार पर भारत में बाजार 7 प्रतिशत तक की मुद्रास्फीति को सहन कर सकते हैं। जब यह सीमा पार होगी, भारतीय इक्विटी का मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:
क्या आप मानते हैं कि बाजारों में अब अल्पावधि से लेकर मध्यावधि में तेजी के कारकों का अभाव है?
भारत एक मजबूत ढांचागत निवेश अवसर है और बाजार इस अर्थव्यवस्था में विकास रिकवरी का कम आंकलन कर रहे हैं। जैसे ही क्रियान्वयन में सुधार आएगा और कंपनियों में निजी पूंजीगत निवेश खर्च में तेजी आएगी, हम भारतीय इक्विटी बाजार में निवेशकों की खरीदारी में और सुधार दर्ज करेंगे। अल्पावधि में भी, बाजार आगामी एलआईसी आईपीओ और सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश की सफलता पर नजर लगाए रहेंगे।

समस्याओं का कितना असर बाजार में दिखा है?
अल्पावधि में, तेजी कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं, हमें कच्चे तेल की कीमतें अगले 12 महीनों में फिर से गिरकर 75 डॉलर पर पहुंचने का अनुमान है। तेल और अन्य जिंस कीमतें उचित स्तरों के मुकाबले काफी ऊपर हैं, जो चिंता की मुख्य वजह है, क्योंकि इससे केंद्रीय बैंकों को उनकी मौद्रिक नीतियों को सख्त बनाने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है। पूरे 2022 के वर्ष में बाजार 1.25 प्रतिशत से ज्यादा की अमेरिकी ब्याज दर वृद्घि की उम्मीद कर रहा है।

विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय इक्विटी बाजारों को किस नजरिये से देख रहे हैं?
सरकार के निजीकरण और विनिवेश के प्रयासों को पिछले साल एफपीआई द्वारा अच्छी मदद मिली थी, हालांकि क्रियान्वयन में नरमी दर्ज की गई थी। इसके अलावा, पिछले साल तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण को लेकर कोई ताजा दिशा निर्देश नहीं आने से भी सरकार को विभिन्न हितधारकों से इस संबंध में दबाव का सामना करना पड़ा है। यह उनके लिए स्पष्ट तौर पर निराशाजनक है। जहां एफपीआई ने सरकार द्वारा चलाए गए विभिन्न सुधारों और भारत में कॉरपोरेट बैलेंस शीट की ताकत पर ध्यान दिया है, लेकिन वे अभी भी खासकर चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भरतीय इक्विटी के ऊंचे मूल्यांकन को लेकर चिंतित हैं।

क्या आप ऊंची मुद्रास्फीति और पूंजी लागत से वित्त वर्ष 2023 में भारतीय उद्योग जगत की स्थिति पर प्रभाव की आशंका देख रहे हैं?
हमारे विश्लेषणों के आधार पर, ऐतिहासिक तौर पर, भारत में बाजार 7 प्रतिशत तक की मुद्रास्फीति को सहन कर सकते हैं। हमारी मुद्रास्फीति संबंधित तेजी (जो तेजी से बढ़ी है) भारतीय इक्विटी के लिए मूल्यांकन प्रभाव डालना शुरू कर सकती है। कॉरपोरेट पूंजीगत खर्च में तेजी शुरुआती चरण में है और हमें निश्चित तौर पर पूंजी की कम लागत बनाए रखने की जरूरत है। हालांकि, मांग पूंजी की लागत की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण कारक है। कंपनियां अपनी बैलेंस शीट को काफी हद तक पहले ही कर्ज मुक्त बना चुकी हैं, इसलिए यदि आर्थिक वृद्घि मजबूत बनी रही (जिसकी उम्मीद हम कर रहे हैं) तो पूंजी की ऊंची लागत बड़ी चिंता नहीं होगी।

आपके पसंदीदा क्षेत्र कौन से हैं?
हमारा मानना है कि भारत की मध्यावधि विकास संभावना और वृद्घि अनुमानों का कम आकलन किया जा रहा है। इसलिए हमारी पसंद बैंकों और सीमेंट कंपनियों जैसे घरेलू चक्रीयता आधारित क्षेत्रों के लिए है। धातु क्षेत्र हमें आकर्षक दिख रहे हैं और आईटी तथा एफएमसीजी जैसे रक्षात्मक क्षेत्र कमजोर साबित हो सकते हैं। ताजा गिरावट के बाद निर्यातकों में हम फार्मा (ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रिडिएंट-एपीआई) और केमिकल क्षेत्रों में अनुबंधित निर्माताओं पर अधिक सकारात्मक हैं।

क्या आप मानते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के शेयर कमजोर प्रदर्शन कर सकते हैं, क्योंकि बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश की रफ्तार सुस्त पडी है?
निजीकरण से जुड़ी सर्वजनिक क्षेत्र की कुछ खास कंपनियों के संदर्भ में, हमारा मानना है कि सरकार की प्रतिबद्घता और क्रियान्वयन क्षमताएं बाजार अनुमानों पर खरी नहीं उतर सकती हैं और इसलिए रेटिंग में कुछ गिरावट की आशंका है, क्योंकि प्रतिक्रिया पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। कुल मिलाकर, हम बैंकिंग क्षेत्र पर सकारात्मक बने हुए हैं, और हम कुछ समय के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भी सलाह दे रहे हैं।

First Published - February 13, 2022 | 11:19 PM IST

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