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PLI में देसी मूल्यवर्धन की होगी समीक्षा, मंत्रालयों से मांगी रिपोर्ट

पीएलआई जैसी योजनाओं के लिए देसी मूल्यवर्धन सीमा काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह अंतिम उत्पाद में स्थानीय उत्पादन की हिस्सेदारी को दर्शाता है

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श्रेया नंदी   
आशीष आर्यन   
Last Updated- April 07, 2026 | 10:52 PM IST

कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली एक उच्चस्तरीय समिति ने सभी मंत्रालयों और विभागों से अनुरोध किया है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के तहत उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं में देसी मूल्यवर्धन (डीवीए) संबंधी आवश्यकताओं के उल्लंघन के मामलों की समीक्षा करें। मामले से जुड़े सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को यह जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि मंत्रालयों और सरकारी विभागों से यह भी कहा गया है कि इस संबंध में विस्तृत जानकारी उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के साथ साझा करें ताकि एक एकीकृत रिपोर्ट तैयार की जा सके। डीपीआईआईटी इस योजना का समन्वय करने वाला प्रमुख विभाग है।

इस संबंध में जानकारी के लिए कैबिनेट सचिवालय को भेजे गए सवालों का खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया।

भारत को विनिर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनाने, निवेश आकर्षित करने, आयात घटाने और निर्यात के मोर्चे पर प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए करीब 5 साल पहले प्रमुख रणनीतिक क्षेत्रों में कुल 14 पीएलआई योजनाएं शुरू की गई थीं। इस योजना के तहत पात्र कंपनियों को प्रोत्साहन का भुगतान वृद्धिशील बिक्री, न्यूनतम निवेश सीमा और कुछ मामलों में अनिवार्य देसी मूल्यवर्धन मानदंडों जैसी कसौटियों को पूरा करने के बाद ही किया जाता है।

पीएलआई जैसी योजनाओं के लिए देसी मूल्यवर्धन सीमा काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह अंतिम उत्पाद में स्थानीय उत्पादन की हिस्सेदारी को दर्शाता है। इसका अंतिम उद्देश्य आयात का विकल्प तैयार करना है।

मगर विभिन्न क्षेत्रों में पीएलआई योजनाओं के तहत प्रोत्साहन के लिए आवेदन करने वाली कंपनियां देसी मूल्यवर्धन के लिए सरकार द्वारा निर्धारित सख्त मानदंडों को पूरा करने के लिए जूझ रही हैं। उदाहरण के लिए, उन्नत रासायनिक सेल (एसीसी) के लिए पीएलआई योजना के मामले में उत्पादन के लिए आवश्यक अधितर खनिज भारत में उपलब्ध नहीं हैं और उनका आयात करना पड़ता है। ऐसे में कंपनियों के लिए 60 फीसदी के देसी मूल्यवर्धन मानदंड को पूरा करना व्यावहारिक नहीं है। भविष्य में कच्चे माल की पर्यापत उपलब्धता न होने पर समस्या और गंभीर हो सकती है।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि मोबाइल फोन और बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स पुर्जों के लिए विनिर्माण के लिए बेहद सफल पीएलआई योजना के लिए देसी मूल्यवर्धन में वृद्धि प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, मेमरी चिप्स, कैमरा, लेंस आदि महत्त्वपूर्ण घटकों की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

अधिकारी ने कहा, ‘इन घटकों के उत्पादन के लिए कारखाने स्थापित करने और देसी स्तर पर विनिर्मित या असेंबल करने में कई साल लग जाते हैं।’

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि दूसरी सबसे बड़ी समस्या भारत में कंपनियों के पास बौद्धिक संपदा अधिकारों की कमी है। ऐसा खास तौर पर प्रमुख डिजाइन घटकों के मामले में दिखता है।

First Published : April 7, 2026 | 10:14 PM IST