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जज का हटना या डटे रहना: केजरीवाल की याचिका खारिज, जानें क्या कहता है ‘रिक्यूजल’ का कानून

केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ किया कि जज का सुनवाई से हटना किसी तय कानून के बजाय उनकी अंतरात्मा और न्यायिक नैतिकता पर निर्भर है

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भाविनी मिश्रा   
Last Updated- May 03, 2026 | 10:01 PM IST

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल तथा छह अन्य लोगों ने एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा शराब नीति मामले में सुनवाई से खुद को अलग कर लें। केजरीवाल ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं है, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश ने याचिका को खारिज कर मामले से हटने से इनकार कर दिया।

अपने फैसले में न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि इस तरह मामले की सुनवाई से हटने की याचिका ने असामान्य कानूनी स्थिति पैदा कर दी है, जहां मुकदमे के किसी भी परिणाम पर याची द्वारा सवाल उठाया जाएगा। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यह एक ऐसी ​स्थिति है जिसमें आप समस्या से निकल ही नहीं सकते, क्योंकि हर विकल्प एक-दूसरे पर निर्भर होगा और मामला सुलझने के बजाय और उलझेगा।

उन्होंने कहा कि न्यायिक निर्णय धारणा या मान्यताओं से प्रभावित नहीं होते। वे पूरी तरह कानूनी एवं तथ्यात्मक आधार पर आकार लेते हैं। जहां केजरीवाल और न्यायमूति स्वर्ण कांता शर्मा दोनों ने भारत के संवैधानिक ढांचे के तहत उन्हें मिले अधिकार का प्रयोग किया, वहीं विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस मामले ने एक बात तो साफ कर दी है कि न्यायिक सुनवाई से किसी जज को हटाने के लिए कोई तय कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। यह पूरी तरह संबं​धित जज की अंतरात्मा की आवाज पर निर्भर करता है।

मामले से हटने का सिद्धांत संवैधानिक परंपराओं, सामान्य कानून के सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होता है, जिसमें न्यायाधीशों को निष्पक्षता और निर्णय लेने के अपने कर्तव्य के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बंबई उच्च न्यायालय में वकील यश जोगलेकर ने कहा, ‘प्रशासनिक न्याय का सिद्धांत यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।’ इसका मतलब है कि किसी को भी अपने व्यक्तिगत हित या मामले में स्वयं फैसला लेने का अ​धिकार नहीं होना चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि मामला यह नहीं है कि पक्षपात का संदेह है या नहीं, बल्कि यह है कि यह दिखाई देता हो। इसी का हवाला देते हुए जोगलेकर ने कहा कि यहां इसका मुख्य उद्देश्य धारणा पर जोर देना है, क्योंकि यह न्याय प्रणाली में लोगों का विश्वास बनाए रखने में मदद करता है।’ साथ ही, अदालतों ने बार-बार वादी की ​शिकायतों पर किसी जज के मामले से हटाने के प्रयासों के खिलाफ चेताया है।

मामले से जज के हटने के आधार और सीमाएं

कानून के विशेषज्ञों का मानना ​​है कि किसी जज के मामले से हटने की मांग आम तौर पर तब की जाती है जब किसी न्यायाधीश की निरंतर उपस्थिति मामले में निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा करती है। सबसे बड़ा आधार वित्तीय हित हो सकते हैं, जहां किसी न्यायाधीश का संबं​धित फैसले में सीधा या अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय हित जुड़ा हो।

सिंघानिया ऐंड कंपनी में पार्टनर अपेक्षा लोढ़ा ने कहा, ‘रिक्यूजल के सामान्य आधार वित्तीय हित, पारिवारिक या व्यक्तिगत संबंध अथवा उसी मामले में वकील के रूप में पेश होने जैसे उदाहरण हो सकते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि सवाल यह है कि क्या किसी वादी को पूर्वग्रह हो सकता है, न कि यह कि क्या पूर्वग्रह वास्तव में सिद्ध हुआ है।

वैश्विक सिद्धांत, भारतीय परंपरा

वैधानिक ढांचा उपलब्ध नहीं होने का मतलब है कि भारत नैतिक दिशानिर्देशों और न्यायिक मिसालों पर बहुत अधिक निर्भर है। प्रोसोल लॉ के संस्थापक और प्रमुख हर्ष के. शर्मा ने कहा, ‘भारत में न्यायाधीशों के सुनवाई से हटने का कोई तय कानून नहीं है। यह प्राकृतिक न्याय, न्यायिक नैतिकता और मामले की ​स्थिति पर आधारित होता है।’

उन्होंने उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसमें वित्तीय हित के मामलों में अपने आप मामले से हटने के आधार और अन्य परिस्थितियों में पक्षपात के संभावित डर के आधार पर फैसला लेने के बीच अंतर किया गया है।’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिनोशे मामले ने एक अतिरिक्त आधार पेश किया, जहां एक न्यायाधीश का किसी पक्ष से जुड़े कारण के साथ संबंध होना उसका मामले से हटने का आधार बन सकता है।

बहस को आकार देने वाले बिंदु

कई हाई-प्रोफाइल मामलों में न्यायाधीशों के सुनवाई से हटने के सिद्धांत पर बहस हुई है। सबसे प्रमुख मामलों में से एक एनजेएसी संविधान पीठ की कार्यवाही में न्यायाधीश जेएस खेहर का खुद को अलग करने से इनकार करने का मामला था। बावजूद इसके कि उनके पिछले जुड़ाव पर आपत्तियां थीं। इस फैसले को व्यापक रूप से फोरम शॉपिंग के अस्वीकृति के रूप में देखा गया।

इसी तरह, न्यायाधीश अरुण मिश्रा के इंदौर विकास प्राधिकरण मामले में खुद को अलग न करने के फैसले ने कथित पूर्वग्रह पर बहस को जन्म दिया, क्योंकि मामले में एक पिछले सत्तारूढ़ से जुड़े कानूनी स्थिति पर पुनर्विचार शामिल था। हाल ही में राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में न्यायाधीश के सुनवाई से हटने  या इनकार करने के कई मामले सामने आए हैं।

पिछले साल सितंबर में विभिन्न अदालतों और अधिकरणों के कुल 15 न्यायाधीशों ने रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। यह केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के सदस्यों के खिलाफ चतुर्वेदी द्वारा दायर एक अवमानना ​​मामले से जुड़ा था।

संतुलन में एक सिद्धांत

भारत में मुकदमों से हटने का कानून एक न्यायाधीश की इच्छा पर बना सिद्धांत है, जो पूरी तरह संवैधानिक नैतिकता से जुड़ा मामला है। यह दो परस्पर विरोधी सिद्धांतों को सुलझाने की कोशिश करता है यानी यह सुनिश्चित करना कि न्याय न केवल किया जाए, बल्कि होता हुआ भी दिखे, जबकि वादियों को सिस्टम में व्यवधान डालने से भी रोका जाए।

First Published : May 3, 2026 | 10:01 PM IST