दिल्ली उच्च न्यायालय के खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि पेरू और चिली दोनों दोनों देशों के प्रसिद्ध अंगूर आधारित पेय ‘पिस्को’ पर दावा कर सकते हैं, बशर्ते उपभोक्ताओं को इसके मूल के बारे में अनुमान लगाने के लिए न छोड़ा जाए। इस तरह उच्च न्यायालय ने दोनों देशों के मनोबल को कायम रखा।
न्यायालय ने ट्रेडमार्क एकाधिकार और प्रतिस्पर्धी भौगोलिक दावों की उचित मान्यता के बीच नाजुक संतुलन को रेखांकित किया। इस क्रम में न्यायालय ने पेरू को ‘पिस्को’ नाम का एकमात्र स्वामित्व देने से इनकार कर दिया। इससे प्रभावी रूप से पुष्टि हुई कि पेरू और चिली दोनों इस पेय पर दावा कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति सी हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला के खंडपीठ ने पेरू को इस नाम पर एकाधिकार अधिकार देने से इनकार करने वाले पूर्व के फैसले को बरकरार रखा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह पेय एक ही राष्ट्रीय पहचान के तहत नहीं बेचा जा सकता है और बोतलों पर अब स्पष्ट भौगोलिक पहचान चिह्न होने चाहिए। पेरू अपने उत्पाद को ‘पेरूवियन पिस्को’ के रूप में बेचेगा जबकि चिली को अपने पेय को ‘चिलीयन पिस्को’ के रूप में लेबल करने का अधिकार बरकरार रहेगा
पीठ ने इंगित किया कि दोनों देशों ने मादक पेय पदार्थों के संबंध में इस चिह्न के लंबे समय से वैध उपयोग को प्रदर्शित किया है। पीठ ने कहा कि भारतीय कानून के तहत वैधानिक प्रावधान विशेष रूप से धारा 9ए में निहित प्रतिबंध के तहत ऐसी परिस्थितियों में बिना शर्त भौगोलिक संकेत प्रदान करने से रोकते हैं।
वस्तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 की धारा 9 विशिष्ट भौगोलिक संकेतों (जीआई) के पंजीकरण पर रोक लगाती है। अस्वीकृति के प्रमुख आधारों में वे जीआई शामिल हैं जो भ्रम पैदा करते हैं, कानूनों का उल्लंघन करते हैं, अभद्र सामग्री रखते हैं या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। यह सामान्य नामों और भ्रामक भौगोलिक निरूपणों पर भी रोक लगाता है। पीठ ने कहा, ‘पेरू और चिली दोनों ने मादक पेय पदार्थों के लिए ‘पिस्को’ चिह्न के उपयोग को स्थापित किया था।