भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को 1 अप्रैल को घोषित कुछ उन उपायों को वापस लेने का फैसला किया, जिनमें बैंकों को रुपया-आधारित नॉन- डिलिवरेबल फॉरवर्ड्स (एनडीएफ) की पेशकश करने से प्रतिबंधित किया गया था, क्योंकि विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता लौट आई थी।
संशोधित नियमों के तहत, बैंक अब कुछ संबंधित-पक्ष के लेनदेन कर सकते हैं, जिसमें मौजूदा अनुबंधों और सौदों को रद्द करना और उन्हें बैक-टू-बैक रूट के माध्यम से आगे बढ़ाना शामिल है। ये संशोधित निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू होंगे।
हालांकि, बैंकों को अभी भी संबंधित पक्षों के साथ सभी विदेशी-मुद्रा डेरिवेटिव सौदे करने की अनुमति नहीं है और 27 मार्च को ऑनशोर डिलिवरेबल बाजार में नेट ओपन पोजीशंस पर तय की गई 10 करोड़ डॉलर की सीमा अभी भी बरकरार है।
कारोबारियों का कहना है कि बैंकों द्वारा 10 अप्रैल की समय सीमा का पालन किए जाने के बाद, केंद्रीय बैंक को आर्बिट्रा ज का जोखिम कम नजर आ रहा है।
8 अप्रैल को मौद्रिक नीति पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि ये नियामकीय उपाय ‘हमेशा के लिए लागू नहीं रहेंगे’। ये उपाय मार्च में विदेशी मुद्रा बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता के कारण लागू किए गए थे, जो पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद पैदा हुई थी। इसके चलते रुपया दबाव में आ गया और 4 प्रतिशत से अधिक गिर गया।
बाजार में पोजीशन बनाई जा रही थीं, जिससे नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड बाजारों और डिलिवरेबल बाजारों के बीच आर्बिट्रेज की स्थिति पैदा हो गई, जिससे केंद्रीय बैंक को ये पाबंदियां लगानी पड़ीं। इन पाबंदियों के कारण बैंकों को जनवरी-मार्च तिमाही में अपने ट्रेजरी परिचालन से नुकसान उठाना पड़ा है।
डीलरों ने कहा कि समान अंतर्निहित एक्सपोजर के विरुद्ध कैंसलेशन और री-बुकिंग पर पहले लगाई गई पाबंदियों के कारण परिचालन संबंधी चुनौतियां पैदा हो गई थीं, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जिनमें भुगतान या प्राप्तियों में देरी हुई थी। इन पाबंदियों ने विदेशी बैंकों के लिए विदेशी ग्राहकों और उनकी भारतीय शाखाओं के बीच रुपये में लेनदेन के प्रबंधन में भी समस्याएं पैदा कीं।