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गरीबी से उबरे 14 करोड़ लोग

Last Updated- December 11, 2022 | 1:37 PM IST

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के ताजा आकलन के अनुसार वर्ष 2015-16 और 2019-2021 के दौरान भारत में गरीबों की तादाद 14 करोड़ तक घट गई जबकि 2005-06 और 2015-16 के बीच गरीबों की संख्या में 27.5 करोड़ की कमी आई है। 

यूएनडीपी और ऑक्सफर्ड पॉवर्टी ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) द्वारा जारी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) गरीबी के माप के रूप में आमदनी से परे कई अन्य पहलुओं पर विचार किया जाता है।
इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे तीन मापदंडों के माध्यम से लोग अपनी रोजमर्रा के जीवन में गरीबी का अनुभव कैसे करते हैं, इसका आकलन किया जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015/2016 से 2019/21 तक बहुआयामी गरीबी में तेजी से गिरावट आई है और यह प्रति वर्ष 11.9 फीसदी के स्तर पर रहा। 
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी)  के ताजा आकलन के अनुसार,  वर्ष 2015-16 और 2019-2021 के दौरान भारत में गरीबों की तादाद 14 करोड़ तक घट गई जबकि 2005-06 और 2015-16 के बीच गरीबों की तादाद में 27.5 करोड़ की कमी आई है।
यूएनडीपी और ऑक्सफर्ड पॉवर्टी ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) द्वारा जारी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) गरीबी के माप के रूप में आमदनी से परे कई अन्य पहलुओं को देखता है जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे तीन मापदंडों के माध्यम से लोग अपनी रोजमर्रा के जीवन में गरीबी का अनुभव कैसे करते हैं। इन तीन मापदंडों को आगे 10 संकेतकों में विभाजित किया गया है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015-2016 से 2019-21 तक बहुआयामी गरीबी में तेजी से गिरावट आई है और यह प्रति वर्ष 11.9 फीसदी के स्तर पर रहा जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार रही जबकि वर्ष 2005-2006 से 2015-2016 के दौरान गरीबी में प्रति वर्ष 8.1 प्रतिशत की गिरावट रही जो मुख्यतौर पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल का वर्ष था।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है क्योंकि गरीबी का शुरुआती स्तर कम होने पर गरीबी में कमी लाना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।’भारत के लिए एमपीआई की वैल्यू 2005-2006 में 0.283 से घटकर 2015-2016 में 0.122 पर आ गई और फिर यह वर्ष 2019-2021 में घटकर 0.069 रह गई।
यह गरीबी के पैमाने में 55.1 प्रतिशत से 27.7 प्रतिशत और फिर 16.4 प्रतिशत तक की गिरावट के अनुरूप है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘वर्ष 2005-06 से 2019-21 के बीच लगभग 15 वर्षों में एमपीआई की वैल्यू, 10 एमपीआई संकेतकों में गरीब लोगों के बीच गरीबी और अभाव की घटना आधे से अधिक थीं।’
हालांकि, यूएनडीपी ने कहा कि भारत में गरीबी में उल्लेखनीय कमी आने के बावजूद, वर्ष 2019-2021 में 22.8 करोड़ गरीब लोगों (किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक) की गरीबी दूर करने का काम काफी कठिन लगा क्योंकि खासतौर पर डेटा एकत्र किए जाने के बाद से इनकी संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में गरीबी पर कोविड-19 महामारी के प्रभावों का पूरी तरह से आकलन नहीं किया जा सकता है क्योंकि देश के 2019-2021 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 71 प्रतिशत डेटा महामारी से पहले एकत्र किए गए थे।
विश्व बैंक के हाल के अनुमानों के अनुसार, महामारी के परिणामस्वरूप वर्ष 2020 में लगभग 5.6 करोड़ भारतीय और गरीब हो गए जिसकी वजह से वैश्विक स्तर पर गरीबों की संख्या में 7.1 करोड़ की वृद्धि हुई। विश्व बैंक बहुआयामी गरीबी को मापता नहीं है और गरीबी से जुड़े इसके अनुमान, 2.15 डॉलर रोजाना की आमदनी वाली क्रय शक्ति समता (पीपीपी) पर आधारित है। 
यूएनडीपी ने कहा कि यह स्पष्ट है कि कई नीतिगत कदम और योजनाएं भारत में गरीबी के संदर्भ में बेहतर नतीजों के संकेत देती हैं। इसने कहा, ‘स्वच्छता, खाना पकाने के ईंधन और बिजली जैसे संकेतकों तक गरीबों की पहुंच बढ़ाने के लिए स्पष्ट रूप से निवेश में बड़े सुधार देखे गए हैं। सार्वभौमिक कवरेज पर नीतिगत जोर ने भी गरीबी कम करने में अपना योगदान दिया है मसलन शिक्षा, पौष्टिक आहार, पानी, स्वच्छता, रोजगार और आवास के कवरेज में।’   
बहुआयामी गरीबी में कमी के संदर्भ में ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों की असमानताएं स्पष्ट हैं और शहरी क्षेत्रों के 5.5 प्रतिशत गरीबों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की संख्या 21.2 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘करीब 22.9 करोड़ गरीब लोगों में से लगभग 90 प्रतिशत यानी 20.5 करोड़ गरीब ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से प्राथमिकता मिलनी चाहिए।’
वर्ष 2015-2016 में सबसे गरीब राज्य बिहार रहा लेकिन यहां गरीबी में सबसे तेजी से कमी आती देखी गई और यह वर्ष 2005-2006 के 77.4 प्रतिशत से घटकर 2015-2016 में 52.4 प्रतिशत हो गई और वर्ष 2019-2021 में 34.7 प्रतिशत हो गई। यूएनडीपी की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, अपेक्षाकृत तौर पर गरीबी में सबसे तेजी से कमी गोवा में आई और इसके बाद जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों का स्थान था।
अपेक्षाकृत रूप से सबसे गरीब राज्यों में गरीबी में कमी आने की रफ्तार नहीं दिखी है। वर्ष 2015-2016 में 10 सबसे गरीब राज्यों में से केवल एक (पश्चिम बंगाल) वर्ष 2019-2021 में 10 सबसे गरीब राज्यों में शामिल नहीं था जबकि बिहार, झारखंड, मेघालय, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान 10 सबसे गरीब राज्यों में शामिल हैं।’

First Published - October 17, 2022 | 9:52 PM IST

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