भारत के कर्जदाता 10 बिजली परियोजनाओं के परिसमापन की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं। देश भर में स्थित इन परियोजनाओं की क्षमता 10.5 गीगावॉट है। दिवाला प्रक्रिया के दौरान इन कंपनियों का कोई ग्राहक नहीं मिला। बोफा सिक्योरिटीज ने अनुमान लगाया है कि इससे बैंकों को इन परियोजनाओं पर चल रहे 37,200 करोड़ रुपये बकाये से हाथ धोना पड़ेगा।
वित्त वर्ष 2018 में भारत सरकार ने दबाव वाली 34 कोयला परियोजनाओं को चिह्नित किया था, जिनकी कुल क्षमता 40 गीगावॉट और बैंकों का कुल बकाया 1.7 लाख करोड़ रुपये था। इनका समाधान दिवाला कानून के माध्यम से किया जाना था। इनमें से करीब 12 परियोजनाओं के मामलों का समाधान हुआ है, जिन पर 59,200 करोड़ रुपये कर्ज था। इनका समाधान कोल लिंकेज देकर किया गया और इनसे इस साल मार्च तक के लिए बिजली खरीद समझौता किया गया है।
35,100 करोड़ रुपये वाली अन्य 5 परियोजनाओं का समाधान संपत्तियों की बिक्री करके किया गया है और उनके बकाये के 44 प्रतिशत की वसूली हो पाई है।
एक बिजली फर्म के सीईओ ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, ‘इन परियोजनाओं में ज्यादातर के साथ कोल लिंकेज नहीं हैं। देश में बिजली की कमी के बावजूद परियोजनाओं का कोई खरीदार नहीं मिला।’
अधिकारी ने कहा कि इन खातों से बैंकों की रिकवरी मामूली है। एस्सार पावर झारखंड के मामले में, जिसमें बैंकों का बकाया 4,200 करोड़ रुपये था, संयंत्र और मशीनरी का आरक्षित मूल्य 180 करोड़ रुपये था।
इस समय लैंको अमरकंटक पावर, और केएसके महानदी सहित 7 परियोजनाओं का बैंक ऋण 45,200 करोड़ रुपये है और परियोजनाएं दिवाला प्रक्रिया से गुजर रही हैं। वहीं शेष 10 परियोजनाओं का परिसमापन किया जा रहा है। जिन परियोजनाओं का परिसमापन किया जा रहा है, उनमें ईस्ट कोस्ट एनर्जी और लैंको विदर्भ पॉवर शामिल हैं।
बैंक कुछ बिजली परियोजनाओं का कर्ज बेचने पर भी विचार कर रहे हैं क्योंकि कुछ पक्षों की याचिका के कारण समाधान प्रक्रिया में देरी हो रही है। केएसके महानदी के मामले में भारतीय स्टेट बैंक ने अपना 3,800 करोड़ रुपये कर्ज आदित्य बिड़ला समूह की संपत्ति पुनर्गठन कंपनी को बेचा है। दिलचस्प है कि भारत सरकार कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने की योजना बना रही है क्योंकि देश को बिजली की कमी से जूझना पड़ रहा है।