भारतीयों को चीन की धरती पर ‘अभिनव’ महानायक मिल गया है। पेइचिंग ओलंपिक में इस आधुनिक ‘अर्जुन’ ने सोने पर निशाना साधकर पूरे देश को मुस्कराने का सबब दे दिया।
चंडीगढ़ के अभिनव बिंद्रा ने पेइचिंग में 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा जीतकर भारत को 28 साल बाद ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिलाया, वहीं ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने का गौरव भी हासिल किया। इससे जहां पूरा देश उन पर गर्व कर रहा है, वहीं विभिन्न राज्य सरकारें-संस्थाएं उन पर धनवर्षा कर रही हैं।
राज्य सरकारों ने बिंद्रा को 1.4 करोड़ रुपये देने की घोषणा की है। बीसीसीआई ने उन्हें 50 लाख रुपये, जबकि रेलमंत्री लालू प्रसाद ने उन्हें आजीवन प्रथम श्रेणी एसी पास देने की बात कही है। यही नहीं, कॉरपोरेट घराने और विज्ञापन एजेंसियां उन्हें अपने साथ जोड़ने की योजना बना रही है।
विज्ञापनों में क्रिकेटरों और फिल्म स्टारों का ही जलवा है, लेकिन इस उपलब्धि के बाद विज्ञापन एजेंसियां बिंद्रा के नाम पर भी विचार कर रहे हैं। इससे पहले बिंद्रा सैमसंग और सहारा ग्रुप से जुड़े थे। सैमसंग इंडिया के संयुक्त प्रबंध निदेशक रविंदर जुत्शी का कहना है कि बिंद्रा के इस जीत से हमें गर्व है और सैमसंग के छठे ओलंपिक रत्न के रूप में शामिल हो गए हैं।
परसेप्ट होल्डिंग के संयुक्त प्रबंध निदेशक का कहना है कि बिंद्रा की इस जीत से अब भारतीयों की क्रिकेट के अलावा, अन्य खेलों में भी दिलचस्पी बढ़ेगी। बिंद्रा की मैनेजर लतिका कनेजा का कहना है कि हीरो होंडा, कोका कोला, पेप्सी आदि भी बिंद्रा के साथ जुड़ने की योजना बना रही है, लेकिन अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
उन्होंने बताया कि यह बिंद्रा पर निर्भर करता है कि विज्ञापन ऑफर्स को कितनी संजीदगी से लेते हैं, क्योंकि वे खुद कारोबारी घराने से संबंध रखते हैं। उनके पिता ए.एस. बिंद्रा 300 करोड़ रुपये के हाईटेक ग्रुप के मालिक हैं। जिनका एग्रो और मीट प्रोसेसिंग, कंप्यूटर गेमिंग और दवा कारोबार है। अब उनकी योजना उत्तराखंड में अस्पताल खेलने की है।
यही नहीं, बिंद्रा जर्मनी की हथियार निर्माता कंपनी वॉल्टर के भारत में एजेंट हैं। यह कंपनी भारत में निशानेबाजी के लिए हथियारों की आपूर्ति करती है। कंपनी की योजना 2010 तक भारत में इसका कारोबार 100 करोड़ रुपये करने का है, जिसके लिए दिल्ली, बेंगलुरु, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई में इसके कार्यालय खोलने की योजना है।
गौरतलब है कि कुछ माह पहले ही अभिनव के पिता और उद्योगपति ए.एस बिंद्रा ने सरकार की ओर से निशानेबाजों को दी जा रही सहायता पर रोष जताया था। हालांकि बिंद्रा के परिवार वालों ने हिम्मत नहीं हारी और प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त फंड जमा किया। इसमें एल.एन. मित्तल चैंपियन ट्रस्ट का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
सच तो यह है कि अभिनव अपनी दक्षता को निखारने के लिए दक्षिण अफ्रीका और जर्मनी में चार माह का प्रशिक्षण लिया, जिसमें सरकार की ओर से कोई उल्लेखनीय मदद नहीं की मिली। हालांकि विज्ञापनों से जुड़ते समय बिंद्रा को इस बात पर ध्यान रखना होगा कि उन्हें लंबे समय में कितना रिस्पांस मिलता है।
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि क्रिकेट को छोड़ दें, तो अन्य खेलों के महारथियों को विज्ञापनों में कम ही सफलता मिली है। हॉकी के खिलाड़ी धनराज पिल्लै को शुरू में विज्ञापन एजेंसियों ने काफी तवज्जो दी, लेकिन बाद में ऐसा उत्साह ठंडा पड़ गया। ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को भी विज्ञापनों में सीमित सफलता ही मिली।
28 साल बाद ओलंपिक में भारत को मिला स्वर्ण पदक
पदक दिलाने वाले बिंद्रा पर सरकार और विज्ञापन एजेंसियां बरसा रही हैं धन