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संशोधित बिजली अधिनियम विवाद: राज्य शक्तिहीन महसूस कर रहे हैं

Last Updated- December 11, 2022 | 3:01 PM IST

संसद के इस मानसून सत्र में विद्युत मंत्रालय ने लोकसभा के पटल पर संशोधित विद्युत विधेयक 2022 रखा था। यह विधेयक देश के विद्युत क्षेत्र में बदलाव के लिए लाया गया है और इसका विशेष फोकस देश में विद्युत वितरण क्षेत्र को बढ़ावा देना है।

 इस संशोधन का राज्यों ने भारी विरोध किया जिसके कारण इस विधेयक को स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। अभी भी अंदर से राज्य सरकारें इस पर अपनी नजर बनाए हुए है। इसके पहले भी विद्युत क्षेत्र में सुधार को लेकर काफी राजनीति हुई थी। जब साल 2000 में चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में विद्युत क्षेत्र में बदलाव के लिए अनबंडलिंग यूटिलिटीज और टैरिफ में सुधार की एक नई योजना लाई गई थी तब उस योजना का भी भारी विरोध हुआ था। इसके कारण हैदराबाद में पुलिस फायरिंग तक की नौबत आ गई थी।

 इस बिल को लेकर राज्य सरकारों का कहना है कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आ जाएगी।  विशेषकर वह राज्य जहां विपक्षी पार्टियों की सरकार है वह कह रही हैं कि यह बिल उनके द्वारा दिए जा रहे कृषि क्षेत्र की सब्सिडी को प्रभावित करेगा। इससे उनके अधिकारों में कमी आएगी।

 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि इसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है।उन्होंने कहा कि इस संशोधित बिल में ग्राहकों को मिलने वाली सब्सिडी पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई गई है। विद्युत अधिनियम 2003 के अनुसार एक विद्युत वितरण नेटवर्क में अलग-अलग उपयोगिता के लिए बिजली दी जा सकती है। लेकिन डिस्कॉम जैसी कंपनियां अपने नेटवर्क से ही विद्युत वितरण करती रहेंगी। अब हम  पूरे देश में एक साझा विद्युत वितरण नेटवर्क प्रदान कर रहे हैं। यह अन्य डिस्कॉम कंपनियों के लिए भी सहायक सिद्ध होगा। लेकिन राज्य सरकारें इन संशोधनों को लेकर बहुत आशावान नहीं है।

 तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने गृह मंत्री अमित शाह से स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रतिस्पर्धा के वेश में केंद्रीकरण को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। इस महीने की शुरुआत में तिरुवनंतपुरम में 30वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में बोलते हुए तमिलनाडु के सीएम ने केंद्र से विधेयक को वापस लेने को कहा था।

इसके अलावा राज्य के स्वामित्व वाले वितरण लाइसेंसधारियों को सस्ती दरों पर गुणवत्तापूर्ण बिजली की आपूर्ति जारी रखने की अनुमति देने के लिए  कहा था। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सालों पुराने नारे  को दोहराते हुए कहा कि ‘केंद्र में संघवाद और राज्यों के लिए ऑटोनामी जरूरी है’।

उन्होंने कहा कि जब हमने 50 साल पहले इसका प्रस्ताव रखा था तब हम कम संख्या में थे। लेकिन आज सभी राज्य सरकारों और क्षेत्रीय दलों ने हमारे इस आदर्श वाक्य को अपना लिया है। केरल के विद्युत मंत्री के कृष्णन कुट्टी ने कहा कि पिछले महीने राज्य सरकार शक्तियों के केंद्रीकरण को लेकर केंद्र सरकार को एक पत्र लिख रही थीं। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पहले ही संशोधनों पर केंद्र से अपना विरोध दर्ज करा चुकी हैं। अपनी पार्टी के सांसदों को इस बिल का संसद में विरोध करने को भी कहा है।

 राज्यों के द्वारा इस हंगामे की वजह क्या है?
इस विधेयक में 35 संशोधन प्रस्तावित हैं। उनमें से आधे केंद्र सरकार से संबंधित है। इसमें बिजली वितरण में निजी निवेश से संबंधित प्रावधान भी किए गए हैं। अभी यह राज्य सरकार के तहत आते हैं। राज्यों और उनके बिजली नियामकों का कहना है कि इससे उनकी ऑटोनॉमी प्रभावित होगी।

बिजली क्षेत्र की सप्लाई चेन में बिजली का उत्पादन और ट्रांसमिशन केंद्र के अंतर्गत जबकि विद्युत वितरण राज्य की सरकार करती हैं।
 संशोधित विधेयक केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) को किसी क्षेत्र में बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आए आवेदनों को मंजूरी देने का अधिकार देता है।

 अधिनियम की धारा 79 के तहत एक नया प्रावधान जोड़ा गया है जिसमें कहा गया है कि इसका एक नया कार्य एक से अधिक राज्यों में बिजली वितरण के लिए लाइसेंस प्रदान करना भी है।

 इसमें टाटा पावर, अदाणी इलेक्ट्रिसिटी, टोरेंट पावर, कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉर्पोरेशन आदि कंपनियां शामिल हो सकती हैं जो पहले से ही कुछ राज्यों में बिद्युत वितरण का काम संभाल रही है।

 राज्य के बिजली नियामकों का कहना है कि इससे नए वितरण लाइसेंसधारियों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

सीईआरसी किसी भी आवेदन को मंजूरी दे सकता है। राज्य बिजली नियामक आयोग (एसईआरसी) इसे अस्वीकार कर सकता है। इस विधेयक के  अनुसार केंद्र सरकार नए लाइसेंस आवेदकों की पात्रता के लिए नियम तैयार करेगा।
 SERC इन नए लाइसेंसधारियों के लिए टैरिफ सीमा तय करेंगे, लेकिन SERC के एक सदस्य ने कहा जिम्मेदारी और जवाबदेही एकतरफा और गलत तरीके से बनाई गई हैं।

 एक सेक्टर विशेषज्ञ का कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि SERC टैरिफ कैसे तय करेगा क्योंकि आवेदन प्रक्रिया के दौरान लाइसेंसधारी का परिचालन क्षेत्र स्पष्ट नहीं होगा। उन्होंने कहा कि विधेयक में स्पष्टता की कमी है और राज्य इसका इस्तेमाल जांच कर रही स्थायी समिति के समक्ष अपनी दलीलों में करेंगे।

 बिल ऐसे समय में आया है जब डिस्कॉम कंपनियां वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति जिसमें हाल के वर्षों में कुछ सुधार देखा गया था अब फिर से खराब हो गई है। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है – आज राज्य विधेयक का विरोध कर रहे हैं लेकिन राज्य अपने यहां विद्युत वितरण की सही व्यवस्था करने में विफल रहे है।

 

First Published - September 25, 2022 | 10:32 PM IST

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