कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों से आहत कागज उद्योग को सरकार भले ही राहत देने में विफल रही हो।
लेकिन कानपुर के वन्य शोध संस्थान (फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीटयूट) के शोधार्थी और लखनऊ विश्वविद्यालय के जैव-रसायन (बॉयोकेमिस्ट्री) विभाग ने इस समस्या का हल तलाश लिया है।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों से कच्चे माल (बांस की लुग्दी और पुनर्चक्रित कागज) की किल्लत की वजह से कागज की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। लेकिन शोधार्थी इन दोनों समस्या का तोड़ निकालने का दावा कर रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के जैव-रसायन विभाग ने कागज निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पौधों में मौजूद ऐसे जीन का पता लगाने में सफलता पाई है, जिससे कागज की गुणवत्ता में काफी सुधार आ सकता है। वहीं फॉरेस्ट इंस्टीटयूट ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे बांस की लुग्दी (बंबू पल्प) की पैदावार को बढ़ाया जा सकता है।
विभाग के प्रमुख प्रोफेसर यू.एन. द्विवेदी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि हमने उस जीन का पता लगा लिया है, जिसकी वजह से कागज में पीलापन आ जाता है और उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि पौधों में लिगनिन नामक रसायन पाया जाता है, जिसकी वजह से कागज पीला पड़ जाता है।
उनका कहना है कि इस जीन को खोज लेने के बाद कागज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अनुमान के मुताबिक, तकरीबन 15 फीसदी कागज पीला पड़ जाने की वजह से बर्बाद हो जाता है। रायबरेली स्थित कागज मिल के सेल्स मैनेजर अजय गुप्ता ने बताया कि पीला पड़ने के भय से हम लंबे समय तक कागज को भंडार कर नहीं रख सकते हैं।
द्विवेदी के मुताबिक, कागज में लिगनिन की मात्रा को कम करके उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे कागज की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि भारी मात्रा में कागज के जल्दी खराब हो जाने से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है, लेकिन इस तकनीक के इस्तेमाल से इस समस्या से भी बचा जा सकेगा।
इसके अलावा, फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीटयूट के शोधार्थियों ने एक ऐसी तकनीक ईजाद की है, जिससे बांस की पैदावार को बढ़ाया जा सकता है। शोधार्थियों के मुताबिक, नई तकनीक के जरिए बांस को जहां रोपना आसान होगा, वहीं यह 6-7 साल में तैयार हो जाता है।
संस्थान के निदेशक उमेश मिश्रा ने बताया कि वर्तमान में जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है, वह काफी खर्चीला है, वहीं बांस को तैयार होने में कम से कम 12 साल लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि नई तकनीक में टिश्यू कल्चर विधि का उपयोग किया गया है, जिससे बांस को कम समय में तैयार किया जा सकता है, वहीं इसकी गुणवत्ता भी बेतहर होती है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई है। अगर इसे स्वीकृति मिल जाती है, तो कागज उद्योगों को कच्चे माल की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा।
लखनऊ विश्वविद्यालय ने खोजा कागज के पीलेपन का तोड़
कागज को लंबे समय तक रखा जा सकेगा सुरक्षित
वन्य शोध संस्थान ने विकसित की बांस की नई प्रजाति
6-7 साल में तैयार हो जाएगा बांस
कच्चे माल की समस्या से मिलेगी राहत