खड़गे और थरूर ने नामांकन भरा, कुल तीन दावेदार मैदान में, परिणाम 19 अक्टूबर को, नाम वापसी 8 अक्टूबर तक
कर्नाटक से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने नाम वापस ले लिया है। इस पद के लिए अब खड़गे, शशि थरूर और झारखंड के पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी चुनाव मैदान में हें।
कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की आखिरी तिथि शुक्रवार अपराह्न 3 बजे खत्म हो गई और इसके नतीजे 19 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे। 8 अक्टूबर तक नामांकन वापस लेने की तारीख है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अध्यक्ष पद की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था लेकिन गुरुवार को सोनिया गांधी के साथ हुई बैठक के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल न करने का फैसला कर लिया।
पार्टी के भीतर थरूर के जीतने की संभावना कम है क्योंकि खड़गे ‘आधिकारिक’ उम्मीदवार के रूप में उभर रहे हैं। लेकिन थरूर ने इस दौड़ से बाहर नहीं निकलने का फैसला किया है। खड़गे के साथ चुनाव लड़ने पर उन्होंने कहा, ‘वह कांग्रेस के भीष्म पितामह हैं, उनका कोई अनादर नहीं है। मैं अपने विचारों का प्रतिनिधित्व करूंगा।’
कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस को बदलाव वाली पार्टी बननी चाहिए, हम पार्टी को मजबूत करने और देश को आगे ले जाने की उम्मीद करते हैं। कांग्रेस नेता ने अपना ‘घोषणापत्र’ जारी करते हुए कहा कि उनका नामांकन पत्र व्यापक समर्थन को दर्शाता है क्योंकि उन्हें एक दर्जन राज्यों के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर मिले हैं।
80 वर्षीय खड़गे एक दलित नेता हैं जिनका पूरा जीवन संघर्षों के बीच गुजरा है और उनका चुनाव जीतने का अच्छा रिकॉर्ड रहा है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में वह अपने गृह नगर गुलबर्गा में हार गए थे और वहां भाजपा को जीत मिली थी लेकिन इस चुनाव के अलावा वह कभी चुनाव नहीं हारे हैं।
वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव में उतरने से पहले उन्होंने कर्नाटक के गुरमित्कल विधानसभा क्षेत्र से लगातार नौ बार जीत हासिल की थी। उन्होंने 2014 में कर्नाटक के गुलबर्गा में तब भी जीत हासिल की थी, जब चुनावी बयार कांग्रेस के खिलाफ थी।
वह 2014 में लोकसभा में कांग्रेस के नेता थे, हालांकि तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी क्योंकि कांग्रेस को विपक्ष के नेता पद के लिए अर्हता हासिल करने के लिए कम से कम 55 सीटें या सदन के कुल सदस्यों की संख्या का 10 प्रतिशत हासिल करना अनिवार्य होता है लेकिन कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिली थीं। उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का नेता चुना गया।
खड़गे ने ट्रेड यूनियन के वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। राज्य में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके चंद्रशेखर ने कहा, ‘वह वास्तव में मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और उनकी ख्वाहिश वर्ष 1972 से थी जब वह गुरमित्कल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते और 1976 में देवराज अर्स सरकार में मंत्री बने तब से थी।’ वह 1980 में गुंडू राव मंत्रिमंडल में, 1990 में एस बंगारप्पा मंत्रिमंडल और 1992 से 1994 तक एम वीरप्पा मोइली सरकार में मंत्री थे।
वर्ष 1994 में जब वह विधानसभा में विपक्ष के नेता बने तब उनकी भूमिका बदल गई। वर्ष 1999 में वह मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शामिल थे, लेकिन एसएम कृष्णा ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। लेकिन वर्ष 2004 में धरम सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बन गई और वह फिर से पिछड़ गए। वर्ष 2013 में कर्नाटक में भाजपा की सरकार गिर गई लेकिन फिर खड़गे ने मौका गंवा दिया और सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री का पद मिला।
एसोसिएट जर्नल्स और यंग इंडियन ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में खड़गे को प्रवर्तन निदेशालय ने तलब किया था। प्रवर्तन निदेशालय ने इस साल की शुरुआत में धनशोधन के एक मामले में उनका बयान दर्ज किया था, जिसकी वह जांच कर रहा है।