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कंपनियों का घटा मुनाफा, तो लकड़ी-कोयले की आई याद

Last Updated- December 07, 2022 | 1:03 PM IST

पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी और उससे पैदा महंगाई को पाटने के लिए अब शहर के उद्योगपति तेजी से कोयले और लकड़ी जनित ईंधन की ओर रुख कर रहे हैं।


बीते कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हुई अप्रत्याशित वृध्दि की वजह से रसायनों, तेल ईंधन आदि उत्पादों के उत्पादन लागत में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे कंपनियों के लागत में वृद्धि हो रही है। यही वजह है कि उद्योगपतियों ने वैकल्पिक ईंधन की ओर रुख करने की पहल की।

निर्माताओं का कहना है कि ईंधन के रूप में कोयले और लकड़ी का इस्तेमाल परंपरागत तेल ईंधन से 60 फीसदी तक सस्ता पड़ता है। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों से चलने वाले बॉयलरों को कोयले और लकड़ी या फिर से दोनों के जरिए काम करने योग्य बनाने के लिए उसे दोबारा से डिजाइन किया जा रहा है।

पनकी में पॉलिएस्टर यार्न विनिर्माण संयंत्र के मालिक अनिल पाण्डेय ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि बॉयलर द्वारा एक किलोग्राम तैयार किए गए उत्पादन की कीमत करीब 10 रुपये है, जबकि कोयले के इस्तेमाल से उत्पादों की लागत में दो रुपये की कमी आ जाती है। पिछले साल की तुलना में वैकल्पिक ठोस ईंधन की वजह से पेट्रोल के इस्तेमाल में 8 फीसदी और डीजल में 5 फीसदी की कमी आई है।

शहर के माल रोड क्षेत्र में स्थित एक पेट्रोल पंप के मालिक बी. डी. अग्रवाल ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में पेट्रोल और डीजल की खपत में कमी आई है। अग्रवाल ने बताया, ‘पिछले महीने हमलोगों ने 40 किलोलीटर पेट्रोल और 160 किलोलीटर डीजल बेचा था जबकि इस महीने हमारी बिक्री में 7.5 लाख रुपये की गिरावट दर्ज की गई है।’ इसके अलावा कई उद्योगपति जेट्रोफा और अन्य वैकल्पिक ईंधन की तलाश में लगे हुए हैं।

इसके साथ ही कई उद्योगों में गन्ने के अवशिष्ट और चावल की भूसी का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा रहा है। गौरतलब है कि कोयले और लकड़ी जैसे ईंधन का बॉयलर में इस्तेमाल पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब बॉयलर की संचरना में बदलाव लाकर, उसमें कार्बन कन्वर्टर और फिल्टर लगाया जा रहा है, जिससे वातावरण में हानिकारक गैसों और पदार्थों कों घुलने से रोका जा सकता है।

नमकीन निर्माता भरत भूषण चावला ने बताया कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने की वजह से स्नैक्स निर्माता अब बॉयलर में बदलाव लाकर उसे ठोस ईंधन से चलाने लायक बना रहे हैं। उन्होंने बातया कि इससे ईंधन लागत में तकरीबन 50 फीसदी की कमी आती है। रुपानी फुटवियर कंपनी और तिरुवाला एक्सपोर्ट कंपनियां भी बॉलयर में बदलाव लाकर उसे कोयला और लकड़ी से चलने योग्य बनाने की सोच रहे हैं। इससे उनकी लागत भी कम होगी, वहीं पर्याप्त ईंधन भी उपलब्ध होगा।

वैकल्पिक ईंधन की पहल…

कई उद्योगों में पेट्रोल-डीजल की जगह हो रहा कोयला-लकड़ी का उपयोग
इसके इस्तेमाल से ईंधन लागत में आती है करीब 50 फीसदी की कमी
जेट्रोफा, गन्ने का अपशिष्ट और चावल की भूसी भी है विकल्प
शहर में पेट्रोलियम पदार्थों की बिक्री पर पड़ रहा असर

First Published - July 24, 2008 | 12:05 AM IST

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