काल करे सो आज कर, आज करे सो अब…यह दोहा भारत में शायद सदियों से लोग जानते हैं।
मगर कच्चे तेल की आग से बुरी तरह झुलसती तेल कंपनियों की हालत जब तक नाजुक नहीं हो गई, सरकार ने इसके मर्म को समझने की कोशिश भी नहीं की।
वह भी तब, जब इस आग की लपटों के भड़कने की रफ्तार इस कदर तेज थी कि पिछले चार माह में ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 25 फीसदी बढ़ चुकी हैं।
इसके बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाने की सरकारी हठ के चलते पिछले वित्त वर्ष में कंपनियों को पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और केरोसीन की बिक्री पर तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था। और चालू वित्त वर्ष में यह घाटा बढ़कर 2,46,000 करोड़ रुपये होने की पूरी आशंका थी।
इस भारी नुकसान के आधे हिस्से को अकेले इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) को ही झेलना पड़ रहा था। अगर तीनों कंपनियों के नुकसान को शामिल किया जाए, तो यह करीब 725 करोड़ रुपये रोजाना के आस-पास बैठेगा।
चुनौतियां अभी और हैं
फरवरी में जब पेट्रोल पर 2 रुपये और डीजल पर एक रुपये की बढ़ोतरी की गई थी, तब भारत 67 डॉलर प्रति बैरल पर कच्चे तेल का आयात कर रहा था, लेकिन अभी करीब 124 डॉलर प्रति बैरल पर तेल आयात करना पड़ रहा है, जबकि बुधवार की बढ़ोतरी में 113 रुपये प्रति बैरल के आंकड़े को ध्यान में रखा गया है। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकती हैं। ऐसा हुआ तो कंपनियों को बहुत ज्यादा फायदा होने वाला नहीं है।
कैसे सुधरेगी तेल कंपनियों की सेहत
कीमतों में बढ़ोतरी से तेल रिटेल कंपनियों को होगी 21,153 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय, शुल्क कटौती के जरिए सरकार देगी 22,660 करोड़ रुपये की राहत
मगर अभी भी हालात हैं थोड़े नाजुक
इस सारी कवायद के बावजूद 29 हजार करोड़ का घाटा अभी भी तेल कंपनियों को झेलना पड़ेगा