मौसम विभाग भी अब इस बात को मान रहा है कि मानसून ने इस साल कई राज्यों में अपना मिजाज बदल लिया है।
पिछले सात सालों से मानसून के साथ हनीमून मना रहे प्रांतों की स्थिति बारिश के अभाव में विकट होती जा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये राज्य अनाज उत्पादन के मामलों में अव्वल राज्यों में से हैं। जाहिर बात है, मानसून की बेरुखी से कृषि उत्पाद में कमी आएगी। जो देश व सरकार दोनों के लिए ही शुभ नहीं होगा।
भारतीय मौसम विभाग के निदेशक बीपी यादव कहते हैं, ‘स्थिति वाकई गंभीर है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।’ यह पूछने पर क्या मानसून से वंचित राज्यों में सूखे जैसी स्थिति हो गयी है, उन्होंने कहा कि किसी भी इलाके को सूखाग्रस्त घोषित करना सरकार का काम है और इसका कोई पैमाना नहीं होता है।
मौसम विभाग के मुताबिक तेलंगाना, तटीय आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, विदर्भ, मराठावाड़ा व मध्य महराष्ट्र के इलाकों में मध्य जून से लेकर जुलाई महीने में सामान्य से 60 फीसदी तक कम बारिश हुई है। कोंकण-गोवा, सौराष्ट्र एवं कच्छ व गुजरात के इलाकों में भी जुलाई महीने के दौरान काफी कम मात्रा में बारिश हुई या फिर नहीं हुई।
देश के 40 फीसदी हिस्सों में कम बारिश होने से कृषि विशेषज्ञ उत्पादन को लेकर अभी से सशंकित होने लगे हैं। इससे आगामी मौसम में मूंगफली, कपास, दाल व चावल की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। देश के 60 फीसदी से अधिक कपास का उत्पादन गुजरात व महाराष्ट्र में होता है।