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हाथों को मिला रोजगार, तो जिंदगी ने पकड़ी रफ्तार

Last Updated- December 07, 2022 | 3:43 PM IST

हरियाणा के मेवात जिले के खेरला गांव की रहने वाली 17 साल की अंजुम आज बेहद खुश है। उसे काम मिल गया है।


10वीं कक्षा की परीक्षा में फेल होने के बाद उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करना चाहिए। लेकिन पास के ही केंद्र सरकार की अपैरल ट्रेनिंग एंड डिजाइन सेंटर में उसने सिलाई का काम सीखा।

अब वह गुड़गांव के एक अपैरल विनिर्माण करने वाली कंपनी के मेवात स्थित मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम कर रही है, जिसके बदले उसे प्रतिमाह 3500 रुपये मिल जाते हैं। मेवात जिले में इस तरह की योजनाओं का लाभ आम लोगों तक पहुंचने लगा है। अशिक्षा और गरीबी की मार झेल रहे लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए अपैरल ट्रेनिंग, नर्सिंग ट्रेनिंग, मुलायम खिलौने बनाने, अचार आदि बनाने की योजनाओं के तहत प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

अभी हाल ही में कोलकाता के आईएमटी संस्थान में लचीले खिलौने बनाने का प्रशिक्षण लेने के लिए पुन्हाना, तावडू, हथीन, छजेड़ा आदि गावों से 11 महिलाओं को प्रशिक्षण के लिए भेजा गया है, जिनकी फीस सहित सारे खर्च राज्य सरकार उठा रही है। इसी तरह से हैदराबाद में नर्सिंग के प्रशिक्षण के लिए 15 लड़कियों का चुनाव किया गया है। दिलचस्प है कि इस इलाके में जितने भी स्वयं सहायता समूह बने हैं उसमें महिलाएं बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं। पुरुषों वाले स्वयं सहायता समूह इनके मुकाबले बहुत ही मामूली हैं।

23 साल की पुष्पा बताती है कि हम लोगों को काम करने की इच्छा है, लेकिन पहले यह समझ में नहीं आता था कि क्या किया जाए। कम उम्र में शादी हो गई। तीन बच्चे हैं और पति महावीर बेरोजगार है। ऐसे में जीवन यापन करना बेहद कठिन था। अब सिलाई का प्रशिक्षण लेकर काम करना शुरू कर दिया है, जिससे 3000 रुपये प्रति महीने कमाई हो जाती है। मेवात डेवलपमेंट एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अतर सिंह अहलावत क हते हैं, ‘यहां सबसे बड़ी समस्या जागरूकता की है।

योजनाओं के बारे में लोगों को जानकारी दी जाती है, लेकिन हालत यह है कि सरकारी खर्चे पर भी पढ़ाई करने के लिए लोग अपनी बच्चियों को बाहर भेजने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे में स्थानीय कर्मचारियों और जन प्रतिनिधियों की मदद से इनको समझाने की कोशिश की जाती है।’ हालांकि अब लोगों का विश्वास लौट रहा है। खेरला गांव की फजरी ने कहा कि उसकी बड़ी बहन ने सिलाई का प्रशिक्षण लिया था, उसके बाद उसे गुड़गांव में सिलाई का काम मिल गया। उसके बाद मुझे भी विश्वास हुआ कि इस पढ़ाई से फायदा है।

अब तो प्रशिक्षण लेने के बाद फजरी को उसके जिले में ही नौकरी मिल गई है और वह अपना खर्च आसानी से निकाल लेती है। गुड़गांव के स्यून अपैरल मैन्युफैक्चरिंग के मालिक करन पुरी ने कहा, ‘मेवात जैसे पिछड़े इलाके में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना नया अनुभव है। अभी यहां काम करने वाली महिलाएं नई हैं और उनके हाथ सधे हुए नही हैं। लेकिन उम्मीद करते हैं कि कुछ महीनों तक काम करने के बाद यह यूनिट भी लाभ देने लगेगी। इस समय मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि पिछड़े इलाके के लोगों को रोजगार मिल रहा है।’

इसके अलावा स्मार्ट नाम की एनजीओ भी यहां रोजगारपरक कार्यक्रमों के तहत रिटेल क्षेत्र में काम करने के लिए लोगों को प्रशिक्षित कर रही है, जिससे करीब एक दर्जन लोगों को रिटेल क्षेत्र में रोजगार मिला है।  राज्य सरकार की कोशिशों के बाद मेवात में सामुदायिक विकास योजना के तहत अब तक 2630 स्वयं सहायता समूहों का निर्माण किया गया है। इससे करीब 40 हजार महिलाएं जुड़ी हैं।

समूहों ने न केवल 6.56 करोड़ रुपये की बचत की है, बल्कि उन्हें जरूरत पड़ने पर कर्ज नहीं लेना पड़ता। वे अपने स्वयं सहायता समूह से ही उधार ले लेती हैं। इसके अलावा सरकार ने 2012 स्वयं सहायता समूहों को ऋ ण उपलब्ध कराया गया है। इन समूहों की सफलता इसी बात से पता चलती है कि जहां पहले इन गांवों के लोग कर्ज लेकर दीवालिया हो जाते थे, वहीं इन समूहों ने एक साल में 2.95 करोड़ रुपये ब्याज अदा किए।
(कल के अंक में पढ़िए ‘रंग ला रही है इलाकाई विकास की रणनीति)

First Published - August 7, 2008 | 12:34 AM IST

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