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बंद नहीं हुआ बेबसी का स्यापा तो बरपेगा जनता का कहर!

Last Updated- December 07, 2022 | 8:06 PM IST

सामर्थ्य भौतिक साधनों से नहीं जन्म लेता है। इसका स्रोत मनुष्य की इच्छाशक्ति होती है। – महात्मा गांधी


नि:संदेह महात्मा गांधी की महज इसी सूक्ति से इस सवाल का जवाब मिल जाता है कि आखिर प्रकृति के आगे अब भी बेबस क्यों हैं हम।

नहीं तो कोई वजह नहीं थी कि गुस्ताव चक्रवात की भारी तबाही से जिस तत्परता और सामर्थ्य के साथ अमेरिकी सरकार ने 20 लाख लोगों को वहां से सुरक्षित निकाल कर उनकी जान बचा ली, वैसा ही कुछ बिहार के 30 लाख लोगों के लिए राज्य और केंद्र सरकार भी कर सकती थी। वह ऐसे कि दोनों ही प्राकृतिक आपदाओं में काफी समानताएं थीं।

मसलन, जिस तरह गुस्ताव की बाबत चेतावनी स्थानीय प्रशासन को चंद रोज पहले ही मिल गई थी, ठीक वैसे ही नेपाल में भारी बारिश के चलते तटबंध के टूटने की चेतावनी भी राज्य सरकार को पहले ही दे दी गई थी।

यही नहीं, जैसे ही आपदा की चेतावनी के हकीकत में बदलने की पुष्टि हुई, बिहार और केंद्र सरकार के बीच चलने वाले आरोप-प्रत्यारोप के राजनीतिक खेल की तरह अमेरिका में भी लुइसियाना सरकार और संघीय सरकार के बीच भी तू-तू-मैं-मैं होने लगी थी। इसके बावजूद अमेरिका में लाखों लोगों की जान बच गई तो इसकी वजह यही है कि गुस्ताव के आने से पहले ही उसने 20 लाख लोगों का पलायन उस क्षेत्र से करवा लिया।

अब सवाल यह उठता है कि भारत में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? इसका जवाब भी साफ है…और वह यह कि न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार भी तब जागी, जब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था। बाढ़ की विनाशलीला को शुरू हुए 11 दिन बीत चुके थे, तब कहीं जाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केंद्र की शरण में पहुंचे और तब केंद्र ने 1000 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद और भारी मात्रा में अनाज देने का ऐलान किया।

लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत की तर्ज पर उनकी यह दरियादिली किसी काम न आ सकी और तबाही ने न सिर्फ 30 लाख से ज्यादा लोगों की दुनिया उजाड़ दी बल्कि हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक और कृषि नुकसान भी कर दिया।

हम खतरों भरी दुनिया में जी रहे हैं…हर दिन जब हम नया अखबार पढ़ते हैं तो हमारी नजरें नई प्राकृतिक आपदा की खबर तलाश रही होती हैं। – मार्क ट्वैन

बाढ़, भूस्लखन, सूखा, भूकंप, आग…इनमें से कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे भारत और यहां के लोग न जानते हों। 1990 से 2000 के बीच औसतन सालाना 4344 लोगों ने इन आपदाओं में अपनी जान गंवाई और तीन करोड़ लोग सालाना इनसे बुरी तरह प्रभावित हुए।

13805 लोगों को लीलने वाला भुज भूकंप, 9885 लोगों को निगल जाने वाला उड़ीसा का चक्रवात और तकरीबन 18 हजार लोगों की मौत का कारण बनने वाली सूनामी तो लोगों के जेहन में आज भी ताजा हैं। अब इसे बदकिस्मती कहें या फिर आग लगने पर कुआं खोदने वाली हमारी सरकारों की देन, कि इन हादसों के चलते पूरी दुनिया में होने वाले जान-माल के नुकसान में भारत ही हर साल बड़े शिकारों में एक रहता है।

आंकड़े बताते हैं कि 1991 से 2000 के बीच हादसों का शिकार होने वाली दुनियाभर की आबादी का 83 फीसदी एशिया के विकासशील देशों का ही था, जिसमें से भी 24 फीसदी आबादी भारतीय लोगों की ही थी। जाहिर है, आपदा प्रबंधन तंत्र के सशक्त न होने और सरकारी लापरवाही के चलते हादसों में जो आर्थिक नुकसान होता है, उससे कहीं ज्यादा हादसा होने के बाद राहत और पुनर्वास के नाम पर सरकारी लीपापोती में भी होता है।

मिसाल के तौर पर भुज के भूकंप में राहत-बचाव आदि में सरकार को 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम फूंकनी पड़ गई थी। अब भी अगर गुस्ताव के मामले से सबक लेते हुए सरकार देश में हर साल आने वाले कुदरती कहर से बचने के पुख्ता इंतजाम कर ले, तो फिर बाद में होने वाली इस रकम के साथ-साथ हजारों-लाखों लोगों की जान को तो बचाया जा सकेगा।

जब कोई सभ्यता समृध्दि के चरम पर पहुंचती है तो उसके पीछे ईश्वरीय अनुकंपा होती है। मगर कोई सभ्यता किसी कुदरती कहर का शिकार होती है तो उसके पीछे खुद उसका ही हाथ होता है। – अब्राहम लिंकन

हर साल बढ़ रही कुदरती कहर की तादाद को देखते हुए दुनियाभर के वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि पर्यावरणीय बदलाव खतरे की घंटी बजा रहे हैं। इसके बावजूद हैरत इस बात की होती है कि महाशक्ति बनने का ख्वाब पालने वाली भारत सरकार आपदा प्रबंधन की लगातार अनदेखी कर रही है।

इस मद में हजारों करोड़ रुपये लगाकर कागजी शेर के तौर पर विभाग और संस्थाएं तो कई बनाई गई हैं लेकिन हकीकत क्या है, इसकी कलई तो सिर्फ बिहार की बाढ़ से ही खुल जाती है। तटबंध टूटने की चेतावनी पहले मिलने के बावजूद सरकार नहीं जागी, यह तो सब जान ही चुके हैं, बाढ़ के कहर के चरम पर पहुंचने के बावजूद पीड़ितों तक राहत सामग्री या बचाव कार्यक्रम की क्या दशा-दिशा है, यह भी किसी से छिपा नहीं रह गया है।

ऐसे में भी अगर हमारे देश के नेता और अफसरान कोसी या कुदरत के कहर के आगे बदस्तूर खुद की बेबसी की सफाई पेश करेंगे तो फिर उसी दिन की आस पर देश को छोड़ा जा सकता है, जब किसी दिन जनता का कहर भी बरपे। जाहिर है, उनके लिए कुदरत के कहर से कम तो वह भी नहीं होगा।

…तब खोदा कुआं
अजय आनंद
टी.वी.कलाकार, वर्सोवा, मुंबई

हमारे यहां प्यास लगने पर कुआं खोदने वाली कहावत लागू होती है। तमाम रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि कोसी एक बार फिर अपना रास्ता बदलने वाली है, उसकी तलहटी में बालू भर गई है, लेकिन सरकार सोती रही।

First Published - September 8, 2008 | 12:36 AM IST

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