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कैंसर की सस्ती सेल थेरेपी देगा भारत

Last Updated- December 11, 2022 | 5:40 PM IST

भारतीय फार्मा कंपनियां और स्टार्टअप कैंसर का सेल थेरेपी से इलाज अमेरिका के मुकाबले केवल 10 फीसदी खर्च में मुहैया कराने की तैयारी में हैं। अमेरिका में रक्त कैंसर का कार्ट सेल थेरेपी से इलाज 8-9 लाख डॉलर में हो पाता है।
किरण मजूमदार शॉ और सिद्धार्थ मुखर्जी समर्थित इम्यूनल थेराप्यूटिक्स, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, चीन की कंपनी शेनझेन प्रेगेन बायोफार्मा और आईआईटी बंबई से निकली तथा हैदराबाद की लॉरस लैब्स समर्थित इम्यूनोएक्ट जैसी कंपनियां दो साल के भीतर भारत में ही कैंसर, खास तौर पर रक्त कैंसर का कार्ट सेल थेरेपी से इलाज शुरू करने की कोशिश में हैं। काइमैरिक एंटीजन रिसेप्टर टी सेल्स (कार्ट सेल्स) वे टी सेल्स हैं, जिनसे जीन इंजीनियरिंग के जरिये कृत्रिम टी सेल्स बनाई जाती हैं। ये टी सेल्स इम्यूनोथेरेपी में इस्तेमाल होती हैं।
आसान शब्दों में कहें तो प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यून सिस्टम हमारे शरीर को संक्रमण और पुरानी या असमान्य कोशिकाओं (कैंसर बनाने वाली समेत) से प्राकृतिक रूप से बचाता है। सेल्युलर इम्यूनोथेरेपी में मरीज की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का इस्तेमाल​ किया जाता है, जिनमें शरीर से बाहर आनुवंशिक रूप से बदलाव किया जाता है और दोबारा मरीज के शरीर में डाल दिया जाता है। इसके नतीजे कुछ सप्ताह में दिखने लगते हैं और कई साल तक बने रहते हैं।
चूंकि बीमारी से लड़ने के लिए जीवित कोशिकाओं में ही बदलाव किए जाते हैं, इसलिए सेल्युलर इम्यूनोथेरेपी को ‘लिविंग ड्रग्स’ या जीवित औषधि माना जाता है। लिविंग ड्रग कोई गोली नहीं होती है बल्कि प्रक्रिया होती है, जो हरेक मरीज में अलग-अलग तरीके से होती है।
भारत में हर साल कैंसर के 10 लाख से अधिक नए मामले आते हैं। विश्व के कुल कैंसर मरीजों में​ से 8 फीसदी भारत में हैं। भारत में कैंसर की दर तो कम है मगर इस बीमारी से मौत की दर काफी अधिक है। अत्याधुनिक उपचारों के बगैर 2040 तक यह आंकड़ा बढ़कर 13 लाख से ऊपर पहुंचने का अनुमान है।
मगर भारत में कैंसर की स्थिति जल्द बदल सकती हैं। इम्यूनल थेराप्यूटिक्स के निदेशक और मुख्य परिचालन अधिकारी अरुण आनंद ने कहा कि ल्यूकीमिया जैसे कैंसर का पारंपरिक इलाज (खाने की दवा, कीमोथेरेपी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट) तीन साल में हो पाता है मगर कार्ट थेरेपी से यह तीन हफ्ते में ही हो सकता है। 2019 में अपना सफर शुरू करने वाली इम्यूनल ने बेंगलूरु में जीएमपी प्रमाणित एकीकृत अस्पताल खोला है।
इसकी अगुआ टीम में बायोकॉन की चेयरपर्सन शॉ और पुलित्जर पुरस्कार विजेता अमेरिकी लेखक एवं कैंसर विशेषज्ञ मुखर्जी के अलावा 5एएम वेंचर्स के सह-संस्थापक और प्रबंध साझेदार कुश परमार भी शामिल हैं। 5एएम वेंचर्स अगली पीढ़ी के जीव विज्ञानियों पर केंद्रित वेंचर कैपिटल कंपनी है।
इम्यूनल न केवल भारत में परीक्षण कर रही है बल्कि इसने यूरोप में परीक्षणों के लिए हॉस्पिटल क्लिनिक डी बार्सिलोना के साथ भी गठजोड़ किया है। आनंद ने कहा कि बहुत से यूरोपीय देशों में दूसरे चरण के परीक्षण शुरू कर दिए गए हैं। आनंद ने कहा कि इस थेरेपी का खर्च अमेरिका में करीब 4.5 लाख डॉलर आता है। वह कहते हैं, ‘इलाज से पहले और बाद में मरीजों की देखभाल समेत कुल खर्च 8 से 9 लाख डॉलर आता है।’ आनंद ने कहा कि उन्होंने भारत में यह थेरेपी अमे​रिका की तुलना में 10 फीसदी खर्च में ही मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है। इससे भारत चिकित्सा पर्यटन और कैंसर के सेल थेरेपी उपचार का केंद्र बन सकता है।
इस बात से इम्यूनोएक्ट के संस्थापक और चेयरमैन राहुल पुरवार भी सहमत हैं। उनके उत्पाद का नाम एच-कार्ट 19 है, जिसका दूसरे चरण का परीक्षण शुरू होने जा रहा है। उनका दावा है कि नतीजे एक सप्ताह में ही दिखने लगते हैं और कैंसर कोशिकाएं मर जाती हैं। पुरवार ने कहा कि यह एक बार होने वाला उपचार है। इसका खर्च एक मरीज के लिए करीब 20 से 30 लाख रुपये आएगा, जबकि यह अमेरिका में करीब 4 करोड़ रुपये है। डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज (डीआरएल) ने पिछले साल चीन की शेनझेनन प्रेगने बायोफार्मा से इस तकनीक का लाइसेंस लिया था। डीआरएल अब विनिर्माण इकाई लगाने के काम में जुटी हुई है। अमेरिका में बीमा कंपनियां इम्यूनोथेरेपी का खर्च देती हैं। भारत में यह इलाज आने के बाद इस दिशा में काम करना होगा। राष्ट्रीय जैवप्रौद्यौगिकी सूचना केंद्र में 2017 में प्रकाशित एक समीक्षा के मुताबिक एक खास किस्म के ल्यूकीमिया वाले 90 फीसदी लोग इस इलाज के बाद पूरी तरह ठीक हो गए। हालांकि इस उपचार की सफलता की दर कैंसर के प्रकार और बीमारी के स्टेज पर निर्भर करती है। दुनिया में कम से कम 40 से 50 फीसदी मरीजों में कई वर्षों बाद भी बीमारी दोबारा नहीं दिखी है।

First Published - July 11, 2022 | 11:08 PM IST

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