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अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2022: आजादी से अब तक का सफर

Last Updated- December 11, 2022 | 3:50 PM IST

साक्षरता किसी भी देश के विकास के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। किसी भी राष्ट्र के जितने अधिक नागरिक साक्षर होंगे उसकी प्रगति उतनी तेज गति से होगी। एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए उसमें रहने वाले नागरिकों का साक्षर होना आवश्यक है। साक्षरता बढ़ने से ना सिर्फ समाज में नागरिकों का मौलिक विकास होता है उसके साथ ही उनका जिंदगी को जीने का नजरिया भी बदल जाता है। 
साक्षरता को प्रोत्साहित करने के लिए ही दुनिया भर में आज यानी 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने की शुरुआत यूनेस्को ने की थी। 7 नवंबर 1965 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया गया था। उसके बाद से हर साल 8 सितंबर को साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। हर साल यूनेस्को द्वारा साक्षरता दिवस को लेकर एक थीम जारी की जाती है। इस साल अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर यूनेस्को के द्वारा जारी थीम ‘ट्रांसफॉर्मिंग लिटरेसी लर्निंग स्पेस’ (Transforming Literacy Learning Spaces) है।

भारत में साक्षरता का सफर

भारत की बात करें तो सैंकड़ों सालों की गुलामी के बाद जब भारत को आजादी मिली तो उस वक्त देश की साक्षरता दर काफी खराब थी। आजादी के बाद साल 1951 में देश की साक्षरता दर सिर्फ 18.3 प्रतिशत थी। उस वक्त महिलाओं की साक्षरता दर 9 प्रतिशत से भी कम थी। यानि 100 में 9 से  भी कम महिलाएं शिक्षित थी। लेकिन समय के साथ साथ लोगों के अंदर शिक्षा को लेकर जागरूकता फैली जिसके कारण देश की साक्षरता दर में लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश की साक्षरता दर 74.4 प्रतिशत थी जिसमें जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर 82.37 प्रतिशत था जबकि महिलाओं का साक्षरता दर बढ़ कर 65.79 प्रतिशत हो गया  था।  राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के डाटा के अनुसार साल 2021 में देश की औसत साक्षरता दर 77.70 प्रतिशत थी जिसमें पुरुषों का साक्षरता दर 84.70 प्रतिशत, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 70.30 प्रतिशत थी। 

लेकिन ये कैसे संभव हुआ ? इससे पीछे संविधान निर्माताओं की दूरदर्शी नजर और सरकारों का प्रयास छुपा है। साल 2002 में 86 वें संशोधन में शिक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21 (अ) के तहत मौलिक अधिकार बनाया गया। इसमें 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने की घोषणा की गई। यह देश की साक्षरता दर बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हुआ। इस संशोधन से पहले शिक्षा मौलिक नहीं संवैधानिक अधिकार था। इसके साथ साथ संविधान अनुच्छेद 30 के तहत सभी अल्पसंख्यकों को शिक्षा, उनके पसंद के संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार देता है। इससे अल्पसंख्यक नागरिकों के साक्षरता दर में काफी सुधार हुआ।

भारत का संविधान राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत 41, 45 और 46 के तहत राज्य को यह निर्देश देता है कि वह सभी नागरिकों की शिक्षा सुनिश्चित करें। इसके साथ संविधान ने यह भी सुनिश्चित किया कि शैक्षिक संस्थानों में किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग, संस्कृति आदि के आधार पर भेदभाव न हो। 

सरकार द्वारा साल 1995 में शुरू की मिड डे मील योजना एक क्रांतिकारी कदम था जिसके कारण बच्चों की दिलचस्पी स्कूल जाने में बढ़ी जिससे साक्षरता दर में सुधार हुआ।

आज भारत अपनी आजादी के 75 वर्ष पूरा कर चुका है। देश में धीरे धीरे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू किया जा रहा है। इसमें भविष्य को ध्यान रखते हुए आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को जोड़ा गया है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की जगह लेगा। नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक शिक्षा के साथ साथ उच्च शिक्षा में भी कई तरह के बदलाव किये गए हैं। उम्मीद है नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति से न सिर्फ देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार देखने को मिलेगा बल्कि इसके साथ साथ देश के साक्षरता दर में भी सुधार होगा।

First Published - September 8, 2022 | 10:44 AM IST

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