रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) केदारनाथ धाम तक बड़ी रेल लाइन बिछाने के पक्ष में नहीं है। आरवीएनएल 73,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली ‘चार धाम रेल परियोजना’ की क्रियान्वयन एजेंसी है। आठ साल तक इस क्षेत्र का सर्वेक्षण और अध्ययन करने के बाद
आरवीएनएल ने एक आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि केदारनाथ तक रेल पटरी बिछाने में कुछ तकनीकी कठिनाइयां हैं और खर्च भी बहुत आएगा। इससे कोई सामरिक मकसद भी पूरा नहीं हो पाएगा।’ इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और भारतीय सेना की सामरिक जरूरतों को देखते हुए यह बड़ी रेल लाइन चार धाम रेल परियोजना के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।
अप्रैल में सौंपी गई इस आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यह रेल पटरी सुदूर क्षेत्र में बिछाई जाएगी, जहां आबादी काफी कम है। इससे स्थानीय लोगों को भी लाभ नहीं होगा। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केदारनाथ धाम के लिए यह रेल लाइन फायदेमंद नहीं दिख रही है और इससे मकसद भी पूरा नहीं हो पाएगा।’
चार धाम रेल परियोजना दुनिया की सबसे महत्त्वाकांक्षी एवं चुनौतीपूर्ण रेलवे परियोजना है। यह परियोजना शुरू करने का विचार 2014 में आया था। परियोजना के तहत 300 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाने की योजना है। यह लाइन सुरंगों, पुलों और पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र ढाल से होते हुए यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ को जोड़ेगी। ये सभी स्थान उत्तराखंड में हैं।
यमुनोत्री और गंगोत्री को देहरादून के निकट डोईवाला से जोडऩे की योजना थी। इसी तरह ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का विस्तार कर इसे भारतीय सेना के लिए सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण केदारनाथ और बदरीनाथ से जोडऩे की योजना थी।
वर्ष 2014 में आरवीएनएल ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें चारों स्थानों को जोडऩे के लिए 30 मार्गों का अध्ययन किया था। इसके बाद ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन को चमोली जिले में सैकोट से जोडऩे की योजना पर अमल होता। सैकोट से दो रेल लाइन निकलतीं, जिनमें से एक केदारनाथ और दूसरी बदरीनाथ तक पहुंचती।
केदारनाथ मार्ग पर सोनप्रयाग तक रेल लाइन बिछाने की योजना था। यह स्टेशन समुद्र तल से 1,654 मीटर ऊंचाई पर बनना था। सोनप्रयाग से केदारनाथ महज 13 किलोमीटर है मगर 3,553 मीटर ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ तक पहुंचने के लिए चढ़ाई काफी दुर्गम है।
अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सर्वेक्षण करने की जिम्मेदारी तुर्की की एक कंपनी को 2018 में सौंपी गई थी। कंपनी ने इस पूरे क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट हाल में सौंप दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सैकोट के बाद एक लाइन केदारनाथ की तरफ मुड़ जाएगी और सोनप्रयाग तक जाकर रुक जाएगी। सोनप्रयाग रेलवे स्टेशन से केदारनाथ जाने के लिए 18 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी होती।
मगर आरवीएनएल ने देखा कि सैकोट तक तो रेल लाइन आ सकती है मगर उससे आगे मक्कूमठ से सोनप्रयाग तक रेल मार्ग तैयार करना असंभव होगा। कंपनी ने कहा कि विभिन्न भूगर्भीय चुनौतियों और निर्माण से जुड़ी कठिनाइयों के कारण रेल लाइन बिछाना चुनौतीपूर्ण होता।
आरवीएनएल ने अपनी आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि केदारनाथ रेल लाइन से कोई रणनीतिक लाभ नहीं मिलता और 214 किलोमीटर लंबाई के कारण ऋषिकेश से सोनप्रयाग तक यह रेल लाइन सड़क मार्ग से भी लंबी होगी। कंपनी ने कहा कि दोनों स्थानों के बीच हवाई सेवा (45 किलोमीटर) शुरू करना वित्तीय लिहाज से भी अधिक फायदेमंद रहेगा।