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कीमतें बढ़ने का गम नहीं, इसका रोना है…बहुत देर में ये काम किया!

Last Updated- December 07, 2022 | 4:41 AM IST

भारत में राजनीतिक मंच पर हमेशा से ऐसा ही नाटक होता रहा है।


हालांकि इस बार पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने का ऐलान कर खुद प्रधानमंत्री ने ऐतिहासिक तौर पर जनता के सामने आकर अपनी मजबूरियों की दुहाई दी।


मगर बाद का किस्सा कमोबेश परपंरागत ही रहा। विपक्षी दलों ने ही नहीं, खुद उनके साझीदार वामदलों ने उनकी एक न सुनी। विरोध के नाम पर क्या भाजपा, क्या वाम और क्या क्षेत्रीय दल, सबने एक होकर हाय-तौबा मचा दी। उनकी हाय-तौबा के चलते ही देशभर के हर तबके के बीच इस गर्मा-गरम बहस का दौर चल पड़ा कि क्या वाकई कीमतें बढ़ाने का सरकारी फैसला जायज है।

कीमतें बढ़ाने का ऐलान करने वाली सरकार और इसके विरोध का झंडा बुलंद करने वाले लोग, दोनों ही यह भूल जाते हैं कि जबरन कीमतें कम रखना कोई इलाज नहीं है बल्कि यही वह दवा है, जिसने देश को एक लगभग लाइलाज बीमारी दे दी है। कच्चे तेल की आग से झुलसने से बचाने के लिए कीमतें बढ़ने से रोकने के मकसद से साल दर साल सब्सिडी के रूप में सरकारी इमदाद बढ़ती रही।

सब्सिडी का बिल बढ़ता गया, तो तेल बॉन्ड जारी करने जैसे फौरी कदम भी लगातार उठाए जाते रहे। यह नहीं सोचा गया कि कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर के करीब पहुंचने को बेकरार हैं। जबकि इसके 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के कयास भी तेज हो चुके थे। नतीजा वही हुआ, जो होना था…तेल कंपनियां दीवालिया होने लगीं। राजस्व घाटा बढ़ने लगा।

सरकारी खजाना खुद सरकारी बचकानेपन से कराहने लगा, लिहाजा अब और मदद देने की गुंजाइश बची ही नहीं। फिर अचानक सरकार मानों नींद से जागी। पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दामों में ऐतिहासिक बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया गया। लोग-बाग भी जब तक सरकारी मदद के खुमार में डूबे थे, तब तक तो सब कुछ ठीक था मगर कीमतें बढ़ते ही मानों देशभर में उबाल आ गया।

उन्होंने यह नहीं समझा कि यह ऐलान करने के लिए सरकार भी इस कदर मजबूर हो चुकी थी कि सर पर खड़े चुनाव के खतरे को भी उसने खतरा नहीं समझा। महज भारतीय ही नहीं, दुनियाभर की तकरीबन आधी आबादी आज सरकार की मेहरबानी से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी जैसी चीजों का लुत्फ बेहद कम कीमत पर उठा रही है। तमाम देशों की सरकारें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जिस दामों पर कच्चा तेल खरीदती हैं, उससे कहीं कम पर लोगों को मुहैया कराती हैं।

वेनेजुएला जैसे देशों में तो महज पांच सेंट प्रति लीटर में पेट्रोल मिलता है। मगर इस दरियादिली का लुत्फ उठाने वाली मौजूदा पीढ़ी ने शायद यह नहीं सोचा कि इसकी भारी कीमत खुद उनके बच्चों को उठानी पड़ेगी। हालत यह है कि तेल पर भारत सरकार की यही दरियादिली सकल घरेलू उत्पाद के कुल तीन फीसदी के खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। मौर्गन स्टैनली की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत का कुल बजट घाटा (केंद्र और राज्यों का) इस साल 9 प्रतिशत की ऊंचाई पर आ चुका है।

विकासशील देशों की सरकारों को आमतौर पर यही डर सताता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें अगर बढ़ा दी गईं तो गरीबों के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी और जनता में उनके खिलाफ माहौल बनने लगेगा। उसके इसी डर का फायदा महंगी कारों से चलने वाले धनकुबेरों की एक बड़ी जमात भी उठाती है। पांच विकासशील देशों में किए आईएमएफ के एक अध्ययन से यह साफ हो ही चुका है कि कुल तेल सब्सिडी का 42 फीसदी इन्हीं धनकुबेरों की भेंट चढ़ जाता है।

बिना इस जमीनी हकीकत को समझे, सरकार ने तेल सब्सिडी के नाम पर अकेले 2007 में ही लगभग 8.7 अरब डॉलर फूंक डाले। और इस साल इसके 29.2 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी आशंका है।

अफसोस तो इस बात का है कि सरकार को यह बात पहले ही समझ में क्यों नहीं आई कि पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस को मौजूदा माहौल में लोगों तक इतने सस्ते में पहुंचाने की कुव्वत उसमें नहीं है तो शायद वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों या कुछ ठोस कदम भी अब तक उठा लिए गए होते। और ऐसा होता तो भले ही आज हमें हर साल कच्चे तेल के लिए इतनी मोटी रकम फूंकनी पड़ रही हो मगर आने वाली पीढ़ियों को तो हम इस बीमारी की चपेट में आने से बचाने में कामयाब हो जाते।

ये कैसी दरियादिली


वह वर्ग जो आज चार पहिया गाड़ी से चल सकता है, उसको सब्सिडी की क्या जरूरत है। सरकार को चाहिए कि उच्च आय वर्ग या निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए पेट्रोल व डीजल की कीमतें अलग-अलग निर्धारित करे और निम्न आय वर्ग से होने वाले नुकसान के कुछ अंश को उच्च आय वर्ग व धनी वर्ग से वसूला जाए। फिलहाल सरकार ने पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में जो बढ़ोतरी की है, उसे कुछ विशेष वर्ग (धनी व्यक्तियों) के लिए ही जायज ठहराया जा सकता है।  – समीक्षा कौर, मनोवैज्ञानिक, 162-बी, लूकरगंज, इलाहाबाद

सदन वाकई अनोखी जगह है। कोई शख्स वहां कुछ बोलने के लिए खड़ा होता है मगर बोलता कुछ भी नहीं है। वहां बैठे लोग कुछ सुनते भी नहीं है लेकिन उसके विरोध के लिए सब एक साथ हो जाते हैं। – बोरिस मार्शलोव

मार्फीन और सरकारी मदद, दोनों एक ही हैं। जैसे ही इसे दिया जाता है, उमंग जागने लगती है लेकिन नशा टूटते ही सब बिखरने लगता है। – मार्टिन  फिशर

क्रिसमस में बच्चे सांता से वे चीजें मांगते हैं, जो उन्हें चाहिए और तब उनकी कीमत बड़े चुकाते हैं।जब बड़े सरकार से वे चीजें मांगते हैं, जो उन्हें चाहिए तो उसकी कीमत खाली होते सरकारी खजाने के चलते कभी न कभी उनके बच्चों को चुकानी पड़ जाती है।  – रिचर्ड लाम

साल दर साल कोई सरकार बस इतना ही करती है कि जो दिया न जा सके, उसके वादे करते रहो और जिसे झेल पाना खुद उसके बूते से बाहर हो, उसे लोगों को देते रहो। – पॉल मार्टिन

First Published - June 9, 2008 | 12:39 AM IST

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