अमेरिकी मंदी और सब-प्राइम संकट का असर बीपीओ कंपनियों और अन्य कारोबार पर भले ही पड़ा हो, लेकिन इससे भारत में मौजूद लीगल प्रोसेस आउटसोर्सिंग कंपनियों (एलपीओ) की चांदी हो रही है।
दरअसल, मॉर्गेज परिसंपत्तियों को बांड में बदलने में तमाम तरह की मुकदमेबाजी का सामना अमेरिकी कंपनियों को करना पड़ रहा है। यही नहीं, सब-प्राइम संकट की वजह से हेज फंड और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। जिससे अमेरिका में मुकदमों की बाढ़ आ गई है। ऐसे में अमेरिकी कंपनियां भारतीय कानूनी सलाहकारों का सहारा ले रहे हैं।
मजूमदार एंड कंपनी के पार्टनर शेहान वर्गीस का कहना है कि अमेरिकी मंदी की वजह से वहां की वित्तीय कंपनियों को इन दिनों खूब मुकदमेबाजी का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह से अमेरिकी लॉ फर्म भारत में मौजूद एलपीओ से अपना काम करा रही हैं, जिससे उन्हें कम खर्च आता है। उनका कहना है भारतीय एलपीओ में कानूनी दस्तावेज आदि तैयार कराने में अमेरिका के मुकाबले 60 फीसदी कम खर्च आता है। यही वजह है कि इन दिनों एलपीओ कंपनियों की खूब चांदी हो रही है।
मैसूर स्थित एसडीडी ग्लोबल सॉल्यूशंस के अध्यक्ष और चेयरमैन रशेल स्मिथ ने बताया कि बहुत-सी कंपनियां यह सोचती हैं कि कानूनी काम बहुत महत्वपूर्ण होता है और उसे अमेरिकी वकील को ही करना चाहिए। हालांकि बढ़ती कागजी खाना-पूर्ति और कानूनी कार्रवाई को देखते हुए कई कंपनियां इस पर विचार कर रही हैं कि भारत से यह काम कराना कहीं अधिक सस्ता पड़ेगा। यही वजह है कि वे दस्तावेजों की समीक्षा का काम भारतीय एलपीओ को सौंप रही हैं।
अमेरिका से काम मिलने की वजह से एसडीडी ग्लोबल की आमदनी में तकरीबन 50 फीसदी का उछाल आया है, वहीं अन्य लीगल कंपनियों की आय भी बढ़ी है। लीगल आउटसोर्सिंग प्रदाता भी मानते हैं कि मंदी किसी के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन अमेरिका में आई मंदी से उनके कारोबार को काफी फायदा पहुंचा है। सब-प्राइम संकट की वजह से अमेरिका में लोगों के दिवालिया होने के मामले भी खूब बढ़ रहे हैं, जिससे वकीलों की मांग बढ़ गई है और कम खर्च को देखते हुए अमेरिकी भारतीय एलपीओ की ओर रुख कर रहे हैं।
वर्गीस का कहना है कि भारतीय लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से सालाना 80,000 वकील निकलते हैं, जो गुणवत्ता के मामले में किसी भी अमेरिकी वकील से कम नहीं होते हैं। ऐसे में अमेरिकी कंपनियों के पास काफी विकल्प होता है। वर्तमान में भारत में करीब 200 एलपीओ काम करही है। इनमें एसडीडी ग्लोबल, सीपीए इंडिया, पेंगिया3 और ऑफिस टाइगर को कानूनी विश्लेषण में माहिर माना जाता है। यही नहीं, यहां काम करने वाले वकीलों और अन्य कर्मचारियों को भी स्तरीय कंपनियों की तरह सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। स्मिथ का कहना है कि मैसूर स्थित हमारी कंपनी हॉलीवुड और अन्य अमेरिकी शहरों के क्लाइंटों का काम देखती है।
सच तो यह है कि भारत में एलपीओ इंडस्ट्रीज अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसका तेजी से विकास हो रहा है। वैल्यू नोट्स के रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 में जहां इसका कारोबार करीब 260 करोड़ रुपये का था, वहीं 2007 में यह बढ़कर 632 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अनुमान के मुताबिक, 2010 तक इसका कारोबार 2,771 करोड़ रुपये का पहुंच सकता है। माइंडक्रेस्ट के प्रबंध निदेशक रोहन दलाल का कहना है भारतीय एलपीओ कंपनियां कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण कार्य को अंजाम देती हैं।
यही वजह है कि विदेशी क्लाइंट इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। करीब 100 देशों के क्लांइट का काम करने वाली सीपीए ग्लोबल के कंट्री हेड भास्कर बागची का कहना है कि अमेरिका और अन्य देशों में आई मंदी से कंपनियों को यह समझ में आ रहा है कि कानूनी कार्रवाई के खर्च में कटौती के लिए इसे आउटसोर्स कराना बेहतर होगा और इसके लिए भारत उपयुक्त स्थान है। यही वजह है कि तमाम एलपीओ कंपनियां भविष्य में अपने कारोबार को विसतार देने की योजना बना रही हैं।
अमेरिका में बढ़ रही मुकदमों की संख्या का फायदा उठा रही भारतीय एलपीओ कंपनियां
वर्ष 2005 में एलपीओ का कारोबार करीब 260 करोड़ रुपये था, जो 2007 में 632 करोड़ रुपये पहुंच गया
वर्ष 2010 तक इसका कारोबार 2,771 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान