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मोंटेक को मंगता है मोटे सेठ की जेब का माल…मगर मिलेगा कइसे!

Last Updated- December 07, 2022 | 7:02 AM IST

सचमुच हमारे देश में बहुत कठिन है डगर पनघट की। इसीलिए यहां किसी भी कारण से खाली हो रहे पैसे के सरकारी तालाब को दोबारा भरने के लिए सरकार के लिए भी झटपट मटकी भरना अमूमन कभी आसान नहीं रहा।


योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने चंद रोज पहले कह तो दिया कि धनी लोगों से पेट्रोल-डीजल की अधिक कीमत वसूले जाने के पूरे आसार हैं मगर यह नहीं बताया कि कैसे? और यह भी नहीं बताया कि धनी उनकी नजरों में आखिर है कौन?

यह तो मोंटेक महोदय अच्छी तरह से जानते ही होंगे कि सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले हमारे मुल्क में गरीबों और मध्यम वर्ग की तादाद ही ज्यादा है, जिनके पास या तो वाहन हैं नहीं और अगर हैं भी तो ज्यादा से ज्यादा कोई सस्ती कार या फिर दोपहिया। फिर आते हैं, टै्रक्टरों के मालिक किसान या एक-दो ट्रकों के मालिक छोटे कारोबारी, जिनकी संख्या भी कोई कम नहीं है।

कच्चे तेल पर मिल रही सब्सिडी, जिससे इन तक पेट्रोल-डीजल अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले काफी सस्ता पहुंचता है, इनके लिए ही जीवन रेखा है, जिसे इसी बहुसंख्यक आबादी तक पहुंचाने के लिए सरकार और तेल कंपनियों का ‘तेल’ निकला है। हालत यह है कि सरकार अपनी जान तो बचाना चाहती है मगर मरते दम तक इसी बहुसंख्यक आबादी को यह रियायत भी जारी रखना चाहती है।

ऐसी ही पसोपेश में उसे यह रास्ता सूझा है कि धनी लोगों से पेट्रोल-डीजल की अधिक कीमत वसूली जाए। इससे किसी को गुरेज नहीं है कि गरीब और मध्यम वर्ग का पेट्रोल-डीजल का बोझ सरकार उठाए और उस तबके से ज्यादा वसूली करे, जो संख्या के लिहाज से भले ही कम हो लेकिन पैसे के लिहाज इतना संपन्न हो कि सब्सिडी न देने पर भी उसे कोई फर्क न पड़े। ताकि बेदम होती सरकार, तेल कंपनियों और बहुसंख्यक लोगों को पूरा तो नहीं मगर कुछ हद तो सहारा मिल ही जाए।

मगर आमतौर पर धनी नजर आने वाले देश की एक बड़ी आबादी यानी मध्यम वर्ग को अगर सरकार धनी मानने वाली  है तो शायद यह उसकी एक और गलती होगी, जो चुनावी साल के लिहाज से बहुत ही घातक होगी। क्योंकि जोड़-तोड़ करके सस्ती कार खरीदने या फिर कर्जों का घी पीकर मकान या अन्य सुविधाओं से लैस ताकतवर शख्स के तौर पर नजर आने का अर्थ कतई यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल की ज्यादा कीमत चुकाने की कुव्वत भी उसमें है।

हो सकता है कि इस बोझ से घबराकर वह गाड़ी का मालिक बनने से ही तौबा कर ले। और अगर पैसे वालों की इस जमात में से मध्यम वर्ग को निकाल दिया जाएगा तो आबादी के लिहाज से महज मुट्ठी भर लोग ही बचेंगे, जिनको दुह कर सरकार अपने जख्म पर कुछ मरहम रखने की उम्मीद रख सकती है। जहां तक आंकड़ों की बात है तो इनमें होंगे देश के आठ हजार से ज्यादा करोड़पति शख्स यानी जिनकी आय सालाना एक करोड़ रुपये से ज्यादा की है।

या फिर 50 लाख रुपये से ज्यादा की सालाना आय वाले सात लाख से ज्यादा लोग और सालाना 10 लाख रुपये से ज्यादा की आय वाले चार लाख के करीब परिवार। यानी सब मिलाकर भी इनकी संख्या हद से हद 15 लाख ही होगी। अब यह तो अर्थशास्त्री और गणितज्ञ ही जानें कि इनसे होने वाली वसूली से सरकारी खजाने में कितना इजाफा होगा या फिर इनसे किस अनुपात में और कैसे पेट्रोल-डीजल पर ज्यादा कीमत वसूली जाए।

अगर वह टैक्सदाताओं के हिसाब से वसूली की कोई नीति बनाएगी तो खुद सरकार भी जानती है कि देश में कुल टैक्स देना वालों में से 94 फीसदी हिस्सा छोटे टैक्सदाताओं का है जबकि लाखों लोग ऐसे भी हैं, जो कमाते तो लाखों-करोड़ों में हैं लेकिन टैक्स का भुगतान या तो कम करते हैं या फिर करते ही नहीं हैं। दूसरा तरीका उसके सामने होगा गाड़ियों की कीमत के आधार पर, तो यह भी खासा जलेबीदार ही है।

देश में कुल वाहन मालिकों की 75 फीसदी तादाद तो दोपहिया वालों की है, जो कि स्वाभाविक तौर पर अधिक वसूली के दायरे से साफ बच निकलेंगे। रही बात कार वालों की तो सस्ती और छोटी कार वालों से भी अधिक रकम वसूलने का ख्वाब बेमानी ही है। इसी तरह एक-दो ट्रैक्टर के मालिक मध्यम दर्जे के किसानों और एक-दो ट्रकों के मालिक छोटे कारोबारी भी ज्यादा वसूली का कोई मतलब नहीं बनता है। अब बचा कौन…25 लाख रुपये से ज्यादा की लक्जरी कार के मालिक।

आंकड़े ही बताते हैं कि 2006 में ऐसी कारों के खरीदार महज 5000 के करीब थे। हालांकि लक्जरी कारों का बाजार देश में 25 फीसदी की तेज दर से बढ़ जरूर रहा है। इस गणित के मुताबिक, शायद ऐसी कारों के मालिक हजारों या चंद लाख ही ही होंगे। संख्या जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि बच पाने के लिए इनके पास कोई बहाना तो कम से कम नहीं ही रहेगा।

और होना भी क्यों चाहिए, क्योंकि कैनेडी साहब ने बजा ही फरमाया है कि धनी लोगों को, जो बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उठा सकते हैं, उन्हें इसे उठाना ही चाहिए। बल्कि आदर्श स्थिति तो यही है कि सरकार की तरफ से होने वाली ऐसी किसी भी कोशिश में उन्हें खुद कंधे से कंधा मिलकर चलना चाहिए। वरना बहुसंख्यक गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को मिल रही सब्सिडी का बोझ उठाने में अगर सरकार या देश खोखला हो गया तो इसमें कोई शक नहीं है कि खुद अमीरों के पैरों तले जमीन भी खिसक जाएगी।

First Published - June 23, 2008 | 2:30 AM IST

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