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मुर्मू ने दाखिल किया नामांकन

Last Updated- December 11, 2022 | 6:02 PM IST

सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन परिसर स्थित राज्यसभा महासचिव के कार्यालय में निर्वाचन अधिकारी पी.सी. मोदी को मुर्मू के नामांकन पत्र सौंपे। मुर्मू के साथ नामांकन दाखिल करने के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह, राजनाथ सिंह, जे.पी. नड्डा, कई राज्यों के मुख्यमंत्री और सहयोगी दलों के नेता मौजूद थे। भाजपा नेताओं के अलावा वाईएसआर कांग्रेस के विजयसाई रेड्डी, ओडिशा की बीजू जनता दल सरकार के दो मंत्री और उसके नेता सस्मित पात्रा, अन्नाद्रमुक नेता ओ. पनीरसेल्वम और तंबी दुरई तथा जनता दल (यूनाइटेड) के राजीव रंजन सिंह भी मौजूद थे। राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए प्रत्येक सेट में निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच से 50 प्रस्तावक और 50 अनुमोदक होने चाहिए। चुनाव जीतने पर मुर्मू देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति होंगी।

उम्मीदवार बनने पर जनजातियों पर नजर
राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की ओर से द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद अब ध्यान जनजातियों पर टिक गया है, जिनका देश की आबादी में 8.67 फीसदी हिस्सा है। मुर्मू ओडिशा के संथाल समुदाय से हैं, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है। यदि मुर्मू राष्ट्रपति बनती हैं, तो राजनीतिक दल जनजातीय समुदाय को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।
पर्यवेक्षकों को लगता है कि मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को ओडिशा विधानसभा चुनाव में फायदा होगा, जहां जनजातीय लोगों की अच्छी संख्या है खासकर संथालों की। पर्यवेक्षकों के मुताबिक मुर्मू के चयन को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव और ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति के हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां जनजातीय आबादी कुल आबादी के 22 प्रतिशत से अधिक है।
संथाल समुदाय में जन्मीं मुर्मू वर्ष 1997 में ओडिशा के रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद रही हैं। वह वर्ष 2000 में बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री बनीं और वर्ष 2015 में झारखंड में भगवा पार्टी की सरकार के समय वहां की राज्यपाल बनीं। वर्ष 2017 में उन्होंने – 1976 संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव करने वाले विधेयक लौटा दिए थे। इस विधेयक में यह सुनिश्चित करते हुए जनजातियों को अपनी भूमि का व्यावसायिक उपयोग करने का अधिकार देने की मांग की गई थी कि भूमि का स्वामित्व नहीं बदला जाएगा। यह अधिनियम पश्चिम बंगाल के साथ झारखंड की सीमा से लगे क्षेत्र में गैर-जनजातियों को जनजातीय भूमि की बिक्री पर रोक लगाता है। उत्कल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर स्मिता नायक ने बताया ‘यह साबित करता है कि मुर्मू भाजपा के दबाव के बावजूद संविधान के अनुसार काम कर सकती हैं। आम तौर पर भाजपा में महिला नेताओं को पद मिलते हैं और वे सशक्त होती हैं। मुझे लगता है कि मुर्मू को भी काम करने की आजादी मिलेगी।’   

First Published - June 25, 2022 | 12:59 AM IST

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