मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में संप्रग सरकार के लिए समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह संकटमोचक के तौर पर सामने उभरे हैं।
इस समय क्या सत्ता पक्ष, क्या विपक्ष और मीडिया और पूरे देश की नजरें उनकी ओर लगी हैं। हमारे संवाददाताओं निस्तुला हेब्बार और सिद्धार्थ ज़राबी ने उनसे लंबी बातचीत की।
एक घंटे तक चली बातचीत में एक बार ही व्यवधान पैदा हुआ, जब संप्रग सरकार के एक ‘चिंतित’ वरिष्ठ मंत्री का उनके पास फोन आया कि क्या वह अपनी पार्टी के सारे सांसदों का वोट सरकार को दिलवा पाएंगे या नहीं? अमर सिंह ने उन मंत्री महोदय का आश्वस्त किया और फिर से मशगूल हो गए जवाब देने में। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश…
आपकी पार्टी परमाणु करार को देशहित में बताते हुए सरकार का समर्थन कर रही है। क्या आप सुधार के दूसरे मोर्चों पर भी आप सरकार का सहयोग करेंगे?
मैं सुधार विरोधी नहीं हूं। मेरे हिसाब से कोई भी परिवर्तन चुनौतियों से भरा होता है। आपके पास परिवर्तन के लिए भावी योजनाएं होनी चाहिएं। हम वामपंथी पार्टियों की तरह अड़ियल नहीं हैं। रिटेल क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सहित कई दूसरी चीजों को लेकर हमारी अपनी चिंताएं हैं। पार्टी का इस मामले में सख्त रवैया रहा है।
लेकिन हम बैंकिंग, बीमा और पेंशन के अलावा अन्य कई क्षेत्रों में सुधार को लेकर खुले हुए हैं। इसके अलावा हम परमाणु क्षेत्र को भी निजी कंपनियों के लिए खोलने के भी हिमायती हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो परमाणु करार के कोई मायने नहीं रह जाएंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब आर्थिक सुधार का दौर शुरू किया था तो धुर वामपंथियों ने ही नहीं बल्कि परंपरागत औद्योगिक घरानों ने भी उनके कदम का विरोध किया था।
इसका नतीजा यही निकला कि उस समय के टॉप 20 उद्योगपतियों को नये लोगों के लिए जगह खाली करनी पड़ी। हमें परिवर्तनों के लिए मनमोहन सिंह जैसे रवैये वाले राजनेताओं की जरूरत है। आने वाले समय में लोग परमाणु करार के लिए मनमोहन, सोनिया के साथ-साथ मुलायम सिंह को भी याद रखेंगे।
ऐसा कहा जा रहा है कि अनिल अंबानी से नजदीकियों की वजह से आपने मुकेश अंबानी को घेरने की पूरी तैयारी कर रखी है। आपका क्या कहना है?
जहां तक स्पेक्ट्रम की बात है तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं केवल वही बातें दोहरा रहा हूं जो रतन टाटा, ट्राई और यहां तक कि आपके समाचार पत्र के संपादक कह रहे हैं। अब अगर इन सभी के विचार मेरे मित्र अनिल अंबानी से मेल खाते हैं तो बताइए मैं क्या कर सकता हूं?
जहां तक विंडफाल प्रॉफिट टैक्स की बात है तो अमेरिका में राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बराक ओबामा भी इसका समर्थन कर चुके हैं। और मुकेश अंबानी की रिफाइनरी को निर्यातोन्मुखी रिफाइनरी का दर्जा देने की बात है तो इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने भी अपनी चिंता सरकार को बताई है। तो क्या वामपंथी पार्टियां, अमेरिकी डेमोक्रेट, आईईए, नियामक एजेंसियां, आपका समाचार पत्र भी क्या अनिल अंबानी के फायदे के लिए ही ये बातें कर रहे हैं।
जब भी आप नीतिगत मामलों की बात करते हैं तो इसमें अनिल अंबानी के साथ आपकी नजदीकी झलकती है।
मेरा ऐसा मानना है कि जो लोग भी भारी मुनाफा कमा रहे हैं, उनको गरीबों और वंचित वर्ग के दर्द के बारे में भी सोचना चाहिए। ‘अच्छे दिनों’ की बात करूं तो मेरे पुराने मित्र मुकेश अंबानी कहा करते थे, ‘पापा हमसे अकसर कहते रहते हैं कि हमें अपने मुनाफे को समाज के एक तबके के साथ बांटना चाहिए।’ इसलिए मैं कहता हूं कि चाहे अंबानी हों या बिड़ला, इनको गरीबों के दर्द को समझना चाहिए।
और अनिल अंबानी से भी निश्चित रूप में मैं यही बात कहूंगा। कांग्रेस की नीतियों से अनिल का कोई लेना-देना नहीं है। हां वह यह जरूर सुझा सकते हैं कि अगली छुट्टियां मनाने के लिए कहां जाना चाहिए या फिर डिनर में क्या होना चाहिए, वह इसलिए कि ये सब मेरी निजी जिंदगी है। इसलिए मैं अनिल और अमिताभ से नजदीकियों को लेकर सतर्कता बरतता हूं।