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अवध में नई शतरंज, खिलाड़ी कलम के

Last Updated- December 07, 2022 | 10:45 AM IST

इतिहास पर गौर करें तो नवाबों के शहर के तौर पर मशहूर लखनऊ में आखिरी जंग 1857 में लड़ी गई थी। इसके लगभग डेढ़ सौ बरस बाद इस सरजमीन पर एक और लड़ाई लड़ी जा रही है।


इसके किरदार अलग हैं, तौर-तरीके अलग हैं और हथियार भी अलग हैं, पर जंग तो आखिर जंग ही होती है। यह जंग है खबरें पहुंचाने की और उसमें भी अगुआ बनने की। थोड़ी सी जमीं और ढेर सा आसमां, कुछ इसी तरह की कहानी है लखनऊ की। आंकड़े खुद इस कहानी की हकीकत बयां करते हैं।

तकरीबन 27 लाख की आबादी वाले शहर के 6 लाख घरों में लगभग साढ़े चार लाख परिवार ही ऐसे होंगे, जो अखबार से जुड़े हैं। इन लोगों के जरिये मुख्यधारा के लगभग 20 अखबार अपने वजूद की जंग लड़ रहे हैं। इसी महीने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सशक्त अखबार अमर उजाला ने बारास्ता कानपुर, राजधानी लखनऊ में दाखिला दर्ज किया।

पहले दिन से ही नंबर एक का दावा करने वाले अमर उजाला को तमाम सनसनी भरे समाचारों के बावजूद अभी बाजार हथियाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ना बाकी है। हालांकि आधुनिक लुक केसाथ उतरे अमर उजाला ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए डिनर सेट जैसे उपहार की स्कीम भी अपना रखी है। शहर के नंबर एक अखबार की कुर्सी पर बरसों से काबिज दैनिक जागरण को लगातार तगड़ी चुनौती दे रहे दैनिक हिंदुस्तान ने भी हाल ही में अपना कलेवर बदला और पाठक संख्या में इजाफा किया है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक नवीन जोशी ने कहा कि लखनऊ भले ही मार्केटिंग के लिहाज से बड़ी जगह न हो पर खबरों के हिसाब से इसका अहम दर्जा है। इसके अलावा आज बड़ी कंपनियों को यूपी के छोटे शहरों में असीम संभावनाएं दिख रही हैं, जिसके चलते भाषाई अखबारों का महत्व बढ़ा है। जोशी के अनुसार अमर उजाला के आने के बाद भी आज टक्कर जागरण और हिंदुस्तान में ही है। उनके मुताबिक आज भी लखनऊ की बड़ी आबादी दो हिंदी अखबार के बजाय हिंदी-अंग्रेजी का कांबो पैक लेती है।

नवीन जोशी ने माना कि बिजनेस अखबार भविष्य की पत्रकारिता है और यह तेजी से बढ़ रही है। द इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार के बाजार में जगह न बना पाने पर जोशी ने अफसोस जताया और कहा कि यह आम जन का अखबार नहीं बन पाया। उन्होंने कहा कि अफसरों और पत्रकारों का यह आज भी प्रिय अखबार है। लखनऊ के सबसे पुराने अंग्रेजी दैनिक द पायनियर के अधिशासी निदेशक व स्थानीय संपादक विजय प्रकाश सिंह के अनुसार प्रिंट मीडिया अभी लखनऊ में और पैर पसारेगा।

कभी मुश्किलों से गुजरे पायनियर को अच्छी स्थिति में ला देने वाले सिंह के अनुसार उनका अखबार लगातार प्रगति कर रहा है। पायनियर इस समय द टाइम्स ऑफ इंडिया के बाद हिंदुस्तान टाइम्स के साथ नंबर दो की लड़ाई लड़ रहा है। अंग्रेजी बाजार पर टाइम्स का एकाधिकार स्वीकारते हुए श्री सिंह कहते हैं कि उनका जोर नंबर दो बनने पर है। गौरतलब है कि 71 फीसदी साक्षरता और 6 लाख परिवारों वाले शहर लखनऊ में हिंदी दैनिक अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, आज, आई नेक्स्ट, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र चेतना, वॉयस ऑफ लखनऊ, यूनाईटेड भारत, राहत टाइम्स, जनसत्ता, निष्पक्ष प्रतिदिन और डीएलए अपना प्रकाशन कर रहे हैं।

इसके अलावा अंग्रेजी दैनिक द पायनियर, इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, द टाइम्स ऑफ इंडिया, बिानेस स्टैंडर्ड, द इकनॉमिक टाइम्स और फाइनैंशियल एक्सप्रेस का प्रकाशन हो रहा है। उर्दू दैनिकों में राष्ट्रीय सहारा उर्दू, कौमी खबरें, आग, सहाफत और इन दिनों का प्रकाशन हो रहा है। मुंबई का हिंदी दैनिक हमारा महानगर एक अगस्त से लखनऊ से प्रकाशन शुरू कर रहा है। जनसत्ता लखनऊ के प्रभारी अंबरीष कुमार के मुताबिक अधिकांश अखबार अब व्यावसायिक हितों के लिए उत्तर प्रदेश आना चाहते हैं न कि पाठक हित के लिए।

First Published - July 12, 2008 | 12:04 AM IST

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