सर्वोच्च न्यायालय ने आज कहा कि यदि कोई इकाई या संस्थान जो ‘सामान्य सार्वजनिक जन उपयोगी सेवा’ के नाम पर किसी व्यापार या वाणिज्य से जुड़ा है, वह परमार्थ संस्थान नहीं रहेगा। ऐसे में वह आयकर कानून के तहत कर छूट का दावा नहीं कर सकता है।
शीर्ष अदालत ने दो अहम मसलों पर सुनवाई की, पहला परमार्थ संस्थान के तौर पर कर छूट का दावा करने के लिए सामान्य सार्वजनिक जन उपयोगी सेवा (आमजन के एक वर्ग के लाभ के लिए) की अभिव्यक्ति का दायरा और दूसरा परमार्थ संस्थान के तौर पर शिक्षण संस्थानों द्वारा कर छूट का दावा करने का अधिकार।
परमार्थ उद्देश्य को कुछ प्रावधानों के तहत परिभाषित किया गया है जिसमें गरीबों की मदद, शिक्षा, चिकित्सा सहायता, पर्यावरण संरक्षण (जल, वन एवं वन्यजीव), स्मारक संरक्षण और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं आदि शामिल हैं। कई संस्थान व्यापार/वाणिज्य करते हैं और इस तरह के कारोबार से होने वाले मुनाफे पर कर छूट के लिए सामान्य सार्वजनिक सुविधा के प्रावधान का उपयोग करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है इस तरह की गतिविधियों से अगर कोई मुनाफा या लाभ होता है तो उसे परमार्थ गतिविधि नहीं माना जाएगा।
अदालत के इस फैसले का व्यापक असर पड़ सकता है क्योंकि परमार्थ संस्थान के नाम पर व्यापार या वाणिज्य से जुड़े संस्थान इसके दायरे में आ सकते हैं और उन्हें कर छूट का लाभ नहीं मिलेगा।
याचिकाओं का दूसरा बैच शिक्षण संस्थानों से जुड़ा था, जिस पर शीर्ष अदालत ने फैसला दिया कि इस तरह के संस्थान को विशुद्ध रूप से शिक्षण कार्य से जुड़ा होना चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अगर शिक्षण संस्थान मुनाफा कमा रहे हैं और परमार्थ के नाम पर उसका परिचालन किया जा रहा है तो उन्हें आयकर कानून की धारा 10 (23सी) के तहत कर छूट का लाभ नहीं मिलेगा। इस आयकर कानून की इस धारा के तहत केवल शिक्षा के उद्देश्य से संचालित विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान अगर कोई आय कमाती है और उसका मकसद लाभ अर्जित करना नहीं है तो उसे कर से छूट दी जाती है।
तीन न्यायाधीशों के पीठ ने फैसले में कहा, ‘यह माना जाता है कि परोपकारी संस्था, सोसाइटी या न्यास आदि के मकसद से खोले गए संस्थान में केवल शिक्षा या शैक्षणिक गतिविधियां होनी चाहिए और उसे लाभ कमाने वाली किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं होना चाहिए।
दूसरे शब्दों में, सोसाइटी, न्यास आदि के उद्देश्य शिक्षा प्रदान करने से संबंधित होने चाहिए या शैक्षिक गतिविधियों के संबंध में होने चाहिए।’ आदेश में कहा गया कि जब उद्देश्य मुनाफ कमाना हो तो ऐसे संस्थान आयकर की धारा 10 (23सी) के तहत कर छूट पाने के हकदार नहीं होंगे।
कर सलाहकार फर्म एमकेएम ग्लोबल में टैक्स पार्टनर संदीप सिंघल ने कहा, ‘शीर्ष अदालत के ताजा आदेश में परमार्थ मकसद के लिए ‘आम लोगों की सुविधा’ शब्द की परिभाषा की व्याख्या की गई है। यह काफी बहस का विषय रहा है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि अगर इस तरह की सेवाओं के बदले में शुल्क लिया जाता है तो संबंधित संस्थान परमार्थ उद्देश्य का तमगा गंवा देगा और इसके अनुरूप वह कर छूट का पात्र नहीं होगा।’