दुनिया की बड़ी से बड़ी आर्थिक महाशक्तियों के बाजार कभी न कभी लुढ़कते ही हैं। और इन दिनों तो क्या अमेरिका, क्या यूरोप और क्या एशिया…हर कहीं मंदी की गूंज सुनाई दे रही है और बाजार लड़खड़ा रहे हैं।
ऐसे में ताकतवर आर्थिक मुल्कों की जमात में शामिल होने की तरफ तेजी से बढ़ रहे भारत और यहां के निवेशकों के लिए भी लाख टके का सवाल यही है कि आखिर पैसे से पैसा बनाने के लिए किधर का रुख करें। पर मिट्टी से भी सोना बनाने वाले इन बाजारों के माहिर खिलाड़ी इस माहौल के लिए भी तैयार रहते हैं।
शायद यही वजह है कि अभी भी बाजार में एक बड़ी जमात ऐसे लोगों की है, जो पैसा झोंकने में किसी तरह की कंजूसी नहीं कर रहे हैं। अब यह बात दीगर है कि निवेश की सही ठिकाना चुनने के लिए उन्होंने अपने-अपने अनुभवों और बाजार की समझ का इस्तेमाल किया है।
अब वह दौर चला गया कि बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। वह यूं कि अगर आप सोच रहे हैं कि बिना कहीं निवेश किए अपने पैसे को किसी गुल्लक में नियम से डालते रहेंगे और ये पैसे रिटायरमेंट या बुढ़ापे के समय में आपके काम आएंगे तो आप गलती कर रहे हैं। वह इसलिए कि सुरसा के मुंह की तरह बढती महंगाई आपकी बचत को निगल जाएगी और आप फिर ठन-ठन गोपाल ही रहेंगे। इसे समझने के लिए गौर फरमाइए 1999 के साल में जब महंगाई 3 फीसदी थी और 2008 पर जब महंगाई 12 फीसदी के करीब है।
जाहिर है, अगर 1999 में आपने 10 हजार रुपये अपनी ‘गुल्लक’ में रखे होंगे तो 2008 में उस 10 हजार में आप वे चीजें नहीं खरीद सकते, जो उस दौर के दामों में आप खरीद सकते होंगे। अगर यही पैसा आपने कहीं ऐसी जगह निवेश किया होता, जहां से महंगाई बढने के बावजूद आपको सालाना अच्छा रिटर्न मिलता तो शायद आप भी बाजार के खिलाड़ी समझे जाते। अगर भारत में बाजार का पुराना इतिहास देखें तो 1980 से 1996 के बीच औसतन 9.34 फीसदी महंगाई के साए में सोने ने 9.51 प्रतिशत का सालाना रिटर्न दिया तो बैंक एफडी ने 9.77 फीसदी, कंपनी एफडी ने 14.40 और शेयरों ने 22.84 फीसदी का।
इस दौर पर हावी रही महंगाई के इस उच्च आंकड़े के चलते जिन्होंने ऐसी जगहों पर निवेश किया, जिनका रिटर्न 6-7 फीसदी ही रहा तो उनका हाल भी कमोबेश पैसे गुल्लक में डालने वालों जैसा ही रहा। मिसाल के तौर पर छह माह तक के लिए बैंक में एफडी कराने वाले लोग। लिहाजा अगर जमा से ही पैसे कमाने हैं तो एक साल से ज्यादा के लिए बैंक में एफडी कराएं या फिर पीपीएफ और सरकारी बॉन्ड की तरफ का रुख करें, जहां सालाना रिटर्न भी अच्छा होगा और टैक्स की बचत भी होगी।
अगर स्टॉक मार्केट में पैसा लगाने के शौकीन हैं तो म्यूचुअल फंड चुनें या फिर शेयर पोर्टफोलियो में काफी विविधता रखें। वैसे शेयर बाजार में लंबे समय के लिए किया गया निवेश फायदेमंद ही होता है, इसको आंकड़े भी बखूबी साबित करते हैं। पिछले 10 साल को अगर देखें तो महंगाई दर 5.6 के सालाना औसत पर रही तो सेंसेक्स में 14.7 फीसदी के सालाना औसत से बढ़ोतरी हुई। इसका सीधा सा मतलब है कि अगर किसी ने 10 साल के लिए शेयरों में निवेश किया होगा तो उसे जो रिटर्न मिला होगा, उस परमहंगाई का असर इस कदर मारक नहीं पड़ सका होगा।
महंगाई और सेंसेक्स के इन सालाना औसत से साफ पता चलता है कि निवेशक को अपने निवेश पर इस दौरान 14.7-5.6 = 9.1 का मार्जिन मुनाफे में हासिल हो गया होगा। इसके अलावा, रीयल एस्टेट में निवेश करना भी महंगाई के चढ़ते ग्राफ को गच्चा देने में लंबे समय के लिहाज से काफी फायदेमंद सौदा साबित हुआ है। जहां तक कमोडिटी (सोना, चांदी और प्लेटिनम आदि) की बात है तो आंकडे ऌस बात के गवाह हैं ही कि महंगाई के साथ-साथ इनकी कीमतों का ग्राफ भी बढ़ता है, जिससे अंतत: रिटर्न भी अच्छा ही रहता है।
बहरहाल, व्यापार गोष्ठी में इस बार बिजनेस स्टैंडर्ड ने इसी मसले पर राय-मशविरा करने की कोशिश की। इसके जवाब में मिली ढेरों प्रतिक्रियाएं और विशेषज्ञों की राय को पढ़कर हमें यकीन है कि आपके लिए भी निवेश के सही ठिकाने की ओर रुख करना आसान हो जाएगा।