बिजली की खस्ता हालत तो समस्या है ही लेकिन इसका ज्यादा उत्पादन भी सिरदर्द बन सकता है। यह बात चौंकाती जरूर है लेकिन सच है।
इधर सरकार अपनी 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 78,000 मेगावॉट की परियोजनाएं पूरी कर ज्यादा बिजली पाने की आस लगाए बैठी है और उधर इससे कहीं ज्यादा क्षमता वाली परियोजनाओं की कमान निजी हाथों में हैं। करीब 100,000 मेगावॉट से ज्यादा क्षमता वाली परियोजनाओं पर काम चल रहा है और उम्मीद है कि यह 2011-12 तक पूरी हो जाएंगी।
जहां इन परियोजनाओं से अतिरिक्त बिजली मिलने की आस है, वहीं किसी योजना के बिना बन रही इन परियोजनाओं ने ट्रांसमिशन नेटवर्क के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं क्योंकि इनमें से कई संयंत्रों के खरीदार अभी तय नहीं किए गए हैं और ऐसा करने की कोई योजना भी नहीं है। इन संयंत्रों के जरिए जो बिजली पैदा की जाएगी, उसे मर्चेंट आधार पर यानी सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को बेचा जाएगा।
पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कॉरपोरेशन को करीब 80,000 मेगावॉट बिजली के ट्रांसमिशन लिंकेज के लिए आवेदन मिल चुके हैं और यह सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं कोयले पर आधारित हैं। इसी वजह से इन्हें झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लगाया गया है, जहां कोयले के भंडार हैं।
हालांकि यह जानकारी नहीं मिल सकी है कि इन परियोजनाओं पर कौन सी कंपनियां काम रही हैं लेकिन इतना जरूर है कि निजी क्षेत्र की हर बड़ी कंपनी इनमें शामिल है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। पावर ग्रिड के अधिकारी ने झल्लाते हुए कहा कि ट्रांसमिशन क्षमता के बारे में कोई भी फैसला तब तक नहीं लिया जा सकता है जब तक कंपनियां यह नहीं बताती कि कितनी बिजली का उत्पादन किया जाएगा और उसे किसे बेचा जाएगा।
कंपनियों के लिए राज्य और केन्द्र की बिजली ट्रांसमिशन इकाईयों के साथ तालमेल बिठा कर चलना जरूरी है। देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क की क्षमता इतनी ज्यादा नहीं है कि इतनी ज्यादा बिजली का ट्रांसमिशन मुमकिन हो सके।