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इलाज पर मरीज का खर्च हुआ कम

Last Updated- December 11, 2022 | 3:40 PM IST

भारत में स्वास्थ्य पर खर्च किए जाने वाले प्रत्येक 100 रुपये में से लगभग 48.2 रुपये सीधे परिवारों द्वारा वहन किए जाते हैं।
यह 15 साल पहले की तुलना में सबसे कम है, लेकिन दुनियाभर के कई अन्य देशों की तुलना में यह अभी भी काफी अधिक हो सकता है। सोमवार को जारी किये गए भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान (2018-19) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ राज्यों में यह खर्च दूसरे राज्यों की तुलना में दोगुना है। 
यह अनुमान है कि भारतीयों ने 2018-19 में स्वास्थ्य पर 5.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इस कुल स्वास्थ्य व्यय में मौजूदा और पूंजीगत स्वास्थ्य व्यय शामिल है। मौजूदा स्वास्थ्य व्यय में अस्पताल में रहने और दवाएं खरीदने जैसी चीजें शामिल हैं। पूंजीगत स्वास्थ्य व्यय में नए अस्पतालों के निर्माण, उपकरणों की खरीद और चिकित्सा शिक्षा पर व्यय सहित अन्य गतिविधियां शामिल हैं। कुल स्वास्थ्य व्यय का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा मौजूदा स्वास्थ्य व्यय है।
एक परिवार अपने कुल स्वास्थ्य व्यय का 48.2 फीसदी खर्च अपनी जेब से भुगतान करता है। समय के साथ यह अनुपात घट रहा है। 2004-05 में यह खर्च 69.4 फीसदी और 2013-14 में 64.2 फीसदी था। परिवारों ने अपनी जेब से कुल मौजूदा स्वास्थ्य व्यय या आकस्मिक चिकित्सा व्यय का 53.2 फीसदी हिस्से का भुगतान अपनी जेब से किया। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में मौजूदा स्वास्थ्य व्यय के प्रतिशत के रूप में जेब से खर्च का वैश्विक आंकड़ा 18.01 फीसदी था।
समय के साथ भारत के आंकड़े में गिरावट आई है। 2017-18 में यह 55.1 फीसदी था। मौजूदा स्वास्थ्य खर्च में सरकार का हिस्सा 34.5 फीसदी है। मौजूदा स्वास्थ्य व्यय के प्रतिशत के रूप में निजी स्वास्थ्य बीमा व्यय 7.3 फीसदी था।
राज्यवार ये अंतराल काफी महत्त्वपूर्ण हैं। कुल स्वास्थ्य व्यय के प्रतिशत के रूप में लोगों ने उत्तर प्रदेश में 71.3 फीसदी, पश्चिम बंगाल  में 68.7 फीसदी और केरल में 68.6 फीसदी खर्च अपनी जेब से किया। कुछ राज्यों में यह आंकड़ा आधे से भी कम था।
असम में यह 36.7 फीसदी, उत्तराखंड में 35.5 फीसदी और कर्नाटक में 33.3 फीसदी था। दूसरे शब्दों में, शीर्ष तीन राज्यों में जेब से खर्च का अनुपात नीचे के तीन राज्यों की तुलना में लगभग दोगुना था।
हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में कुल स्वास्थ्य व्यय में 2018-19 में 4.2 फीसदी की कमी देखी गई, जो 2004-05 में 3.2 फीसदी थी। वहीं, मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद प्रति व्यक्ति कुल स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि हुई है।  2004-05 में 2,066 रुपये से बढ़कर यह 2018-19 में 3,314 रुपये हो गई।
सरकार द्वारा वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा व्यय 2013-14 से 167 फीसदी बढ़ा है। 2013-14 में यह 4757 करोड़ रुपये था जो अब बढ़कर 2018-19 में 12680 करोड़ रुपये हो गया। यह मुख्य रूप से आयुष्मान भारत- प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना पर खर्च के कारण होता है।
इस साल मार्च में स्वास्थ्य राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार ने कहा था कि सितंबर 2018 में योजना की शुरुआत के बाद से मार्च 2022 तक आयुष्मान भारत योजना के तहत 37,185 करोड़ रुपये अस्पतालों के लिए अधिकृत थे। मंत्री ने कहा था कि अगर यह योजना न होती तो लाभार्थियों को 1.5 से 2 गुना खर्च अपनी जेब से करना पड़ता। 
एनएचए 2018-19 ने यह बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर केंद्र का खर्च 30,578 करोड़ रुपये था। केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) पर 4,060 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि रक्षा चिकित्सा सेवाओं को 12,852 करोड़ रुपये और रेलवे स्वास्थ्य सेवाओं को 4,606 करोड़ रुपये मिले।

First Published - September 12, 2022 | 10:34 PM IST

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