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सरकारी स्वास्थ्य खर्च जितना ही महंगा पड़ रहा प्रदूषण

Last Updated- December 11, 2022 | 6:52 PM IST

हाल में जारी एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक पारंपरिक प्रदूषण की वजह से भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 1 प्रतिशत जितना ही नुकसान उठाना पड़ता है। यह सरकार द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर खर्च की जाने वाली रकम के बराबर ही है। आंकड़ों की गणना उस उत्पादन के खत्म होने के रूप में की जाती है जिसका नुकसान तब होता है जब प्रदूषण की वजह से बनी स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण किसी व्यक्ति की समय से पहले मौत हो जाती है।  दि लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ के ‘प्रदूषण एवं स्वास्थ्य: प्रगति अद्यतन’ शीर्षक नाम के अध्ययन के अनुसार, कुल आंकड़ा वर्ष 2000 में सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 3.2 प्रतिशत से कम होकर 2019 में जीडीपी का लगभग 1 प्रतिशत हो गया है। गैर-लाभकारी समूह पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्य और केंद्र सरकारों ने पिछले दशक में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद के 1.1 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत के बीच खर्च किया। कोविड-19 महामारी के बीच 2020-21 में यह बढ़कर जीडीपी का 1.8 प्रतिशत हो गया।
पारंपरिक प्रदूषण में ठोस ईंधन से घरों में वायु प्रदूषण बढऩे, गंदे पानी, स्वच्छता की कमी आदि से होने वाली मौत शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, यह नुकसान और अधिक होगा अगर कोई प्रदूषणकारी उद्योगों के कारण होने वाली मौतों पर भी विचार करता है। इसमें कहा गया है, ‘प्रदूषण के आधुनिक रूपों के कारण वर्ष 2000 और 2019 के बीच आर्थिक नुकसान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात के रूप में बढ़ गया है और अब इन देशों में से प्रत्येक में इसका स्तर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.0 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। प्रदूषण के चलते स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों की गणना की जाए तो पूर्ण आर्थिक नुकसान और प्रदूषण का असर असंगठित क्षेत्रों से लेकर पर्यावरण पर व्यापक होने की संभावना है।’
इस अध्ययन में कहा गया है कि यूरोपीय संघ और अमेरिका में प्रदूषण के आधुनिक रूपों के कारण नुकसान कम हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह आंशिक रूप से अन्य देशों में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की आउटसोर्सिंग को दर्शाता है। रिपोर्ट में घरेलू प्रदूषण को कम करने के लिए भारत के प्रयासों का जिक्र भी इस रिपोर्ट में किया गया है। इसमें कहा गया, ‘भारत ने घरेलू वायु प्रदूषण के खिलाफ  प्रयास किए हैं, विशेष रूप से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना कार्यक्रम के माध्यम से लेकिन 2019 में अब भी वायु प्रदूषण से संबंधित मौतों की दुनिया में सबसे बड़ी अनुमानित संख्या थी।’ विश्व स्तर पर सबसे अधिक प्रदूषण से होने वाली मौतों के लिए वायु प्रदूषण भी जिम्मेदार है। इसके चलते 2019 में करीब 67 लाख लोगों की मौत हो गई थी। यह महामारी शुरू होने के बाद से कोविड-19 से होने वाली कुल दर्ज मौतों की तुलना में अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कुल रिकॉर्ड की गई मौत की संख्या 63 लाख है।
जल प्रदूषण की वजह से कम लोगों की मौत होती है लेकिन यह फिर भी 2019 में 10 लाख से अधिक हो गया। वायु प्रदूषण से महिलाओं की तुलना में पुरुषों की अधिक मौत होने की संभावना होती है जबकि जल प्रदूषण के मामले में स्थिति उलट है।
इसमें कहा गया है, ‘पुरुषों को महिलाओं की तुलना में परिवेश के वायु प्रदूषण और व्यावसायिक प्रदूषकों के संपर्क में अधिक रहना पड़ता है जिसकी वजह से उनके मरने की अधिक संभावना होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं और बच्चों में जल प्रदूषण के संपर्क में आने से मरने की अधिक संभावना होती है।’
इसमें कहा गया, ‘स्वास्थ्य पर प्रदूषण का प्रभाव युद्ध, आतंकवाद, मलेरिया, मानव इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी), तपेदिक, ड्रग और शराब की तुलना में बहुत अधिक है और प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों की संख्या धूम्रपान के कारण होने वाली मौतों के बराबर है।’ अध्ययन में कहा गया है कि केवल कुछ ही अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां स्वास्थ्य और प्रदूषण एजेंडे को बढ़ावा दे रही हैं और उन्हें मामूली समर्थन मिल रहा है।

First Published - May 20, 2022 | 12:12 AM IST

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