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लाल-पीला प्रकाश

Last Updated- December 07, 2022 | 1:41 PM IST

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) में विद्रोहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती है और अगर पार्टी ने किसी को विद्रोही घोषित कर दिया है तो वह तगमा ताउम्र उससे जुड़ा ही रहता है।


पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने पार्टी आदेश की अवहेलना करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निष्कासित करने की जो घोषणा की है उसके पीछे पूरी पार्टी एकजुट होकर समर्थन में खड़ी है। पर ऐसे भी कई लोग हैं जिनका मानना है कि करात के पूर्ववर्तियों ने इस मसले को कुछ और ही तरीके से निपटाया होता।

ऐसा मानने वाले लोगों का तर्क है कि पार्टी पर अपना दबदबा कायम करने के कई दूसरे तरीके भी हो सकते थे। करात चाहते तो वह पार्टी की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के साथ लोगों तक यह संदेश भी पहुंचा सकते थे कि उनका पार्टी में रुतबा कितना बड़ा है। जैसे ही करात को लगा कि लोकसभा अध्यक्ष पार्टी के अनुशासन का पालन नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने कठोर कदम उठाने से कोई परहेज नहीं किया।

जबकि वह चाहते तो इतने कठोर फैसले से बच सकते थे। इस दौरान करात का जो चेहरा देखने को मिला वह कुछ नया था। पार्टी के महासचिव बनने के बाद भी करात मीडिया से दूर ही रहे। मीडिया से रू-ब-रू होने का जिम्मा सीताराम येचुरी का होता है। पर पार्टी में करात के सहयोगी हमेशा उनसे कहा करते हैं कि वह अपने स्वभाव को बदलें और ज्यादा से ज्यादा लोगों से घुले मिलें। इस बार करात ने कुछ ज्यादा ही सख्त रवैया अपनाया है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटकों को अब यह जानने की उत्सुकता होगी कि क्या करात भविष्य में गठबंधनों में और अपने दोस्तों के लिए भी इसी तरीके का रुख अख्तियार किया करेंगे। लालू प्रसाद ने भी लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव के दौरान जब भाषण दिया था तो कमोबेश उनका पूरा भाषण वाम पंथियों के साथ उनकी दोस्ती को ही समर्पित था और रेल मंत्री ने एक बार कहा भी कि पार्टी का यह रवैया थोड़ा अटपटा जरूर है पर पार्टी कभी भी अपने दोस्तों के पास वापस लौट सकती है। इस बयान के पीछे राजनीतिक सूझबूझ जुड़ी हुई है।

First Published - July 25, 2008 | 11:08 PM IST

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