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कहीं हो कोई महारथी, जिधर महंगाई अस्त्र, उधर विजयश्री!

Last Updated- December 07, 2022 | 9:43 AM IST

महाभारत के संग्राम के लिए महारथियों से सजी-धजी रणभूमि के बीचों-बीच चल रहे श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद को दूरदृष्टि-दूरश्रवण क्षमता से देख-सुनकर धृतराष्ट्र से संजय ने यही श्लोक कहा था।


कुछ ऐसा ही नजारा है, इन दिनों देश का, जहां चुनावी महाभारत के लिए रणभूमि में महारथियों अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित नजर आने लगे हैं। इनमें से किसी के पास महंगाई का मारक अस्त्र है तो कोई ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर ताल ठोंक रहा है तो किसी के तरकश में परमाणु करार का तीर चमचमा रहा है।

इन हथियारों की बदौलत ही हर महारथी हस्तिनापुर यानी दिल्ली की सत्ता के लिए होने वाली महाभारत में विजयश्री पाने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहा है। लेकिन जिस तरह से संजय ने भांप लिया था कि कोई भी महारथी, किसी भी खेमे में हो, विजयश्री तो उसी को मिलेगी, जिसके खेमे में जनार्दन यानी श्रीकृष्ण होंगे।

और इस चुनावी महाभारत में श्रीकृष्ण की भूमिका में है जनता जनार्दन और संजय सरीखी भूमिका निभाने का सुअवसर मिला है बिजनेस स्टैंडर्ड को, जिसने व्यापार गोष्ठी की अपनी दूरदृष्टि और दूरश्रवण क्षमता से देशभर के प्रबुध्द पाठकों और विशेषज्ञों की सहायता से चुनावी महाभारत का रुख भांपने की कोशिश की है।  और इसके लिए बस इतना भर ही काफी है कि महंगाई, ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी और परमाणु करार के हथियारों में से कौन सबसे मारक है, इसकी जांच कर ली जाए। इसे जांचने की कवायद में जो नतीजा निकला, शायद उसको जानकर किसी को हैरत नहीं होगी।

कमोबेश शत प्रतिशत पाठकों ने यही कहा कि इस बार का चुनावी मुद्दा कुछ और नहीं बल्कि महंगाई ही होने जा रहा है। अब परमाणु करार को लेकर कैकेयी हठ करती सरकार को अगर यह मुगालता हो कि इसे देशहित में अंजाम दी गई एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर लेकर वह इस महाभारत में उतरेगी तो उसके साथ जनता होगी, तो शायद उसे धक्का पहुंचने वाला है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगी कच्चे तेल की आग के कारण बढ़ाई ईंधन की कीमतों को लेकर अपनी मजबूरी की दुहाई भी उसके कोई काम नहीं आने वाली और न ही इसे लेकर उसे चक्रव्यूह में घेरने का मुगालता पालने वाले राजनीतिक दलों के भी हाथ कुछ नहीं आने वाला।

वैसे तो जनता जनार्दन के मूड को बेशक सभी भांप चुके हैं, चाहे वह सरकार हो या सत्ता में बाहर-भीतर के उसके साथी या फिर विपक्षी सेना। यही वजह है कि संकटमोचक बनकर सरकार को उबारने वाली सपा भी कह रही है कि चिदंबरम मित्र तो हैं लेकिन महंगाई को उन्हें हर हाल में रोकना ही होगा। लेकिन मुलायम ऐसे वक्त में भी सरकार का संगी बनने को तैयार हैं, जबकि कहीं हो भी हो सकता है कि जनता जनार्दन उन्हें भी इस काजल की कोठरी की कालिख पोत दे।

उनका तर्क है कि न परमाणु करार, न महंगाई, वह तो सांप्रदायिकता यानी बीजेपी के खतरे से देश को बचा रहे हैं। बहरहाल, उनका क्या होगा यह तो जनता ही जाने लेकिन हालात सचमुच दिलचस्प हैं। तभी तो, चार साल तक सरकार की गलबहियां करने वाले वाम दल भी सरकार को बीच मंझधार में छोड़ कर जा रहे हैं बल्कि यह कहने में गुरेज नहीं कर रहे कि महंगाई के लिए कांग्रेस ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। और तो और, रेल मंत्रालय की कुर्सी का सुख भोग रहे लालू प्रसाद भी अपनी रेल को महंगाई का लाल सिगनल देखकर चुनावी स्टेशन पर जल्दी ले जाने को तैयार ही नहीं हैं।

मायावती जी ने तो चतुर सुजान की तरह यूपीए के डूबते जहाज पर से सबसे पहले ही छलांग लगा दी। ऐसे में एनडीए खेमे को मानों बिन मांगे मोती मिल गए हैं और इस हथियार को चलाकर चुनावी महाभारत में विजयश्री पाकर हस्तिनापुर यानी दिल्ली का साम्राज्य पाने का ख्वाब अब समूची एनडीए सेना को दिन-रात दिखने लगा है। अब इस हथियार को चला पाने में उन्हें कितनी सफलता मिलती है या फिर सरकार चुनावी महाभारत होने तक इससे बचाव के लिए क्या कुछ कर दिखा पाती है, यह तो चुनावी महाभारत का बिगुल बजने के बाद ही पता चल सकेगा।

लेकिन इससे पहले हम जरूर ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर विचार-विमर्श के जरिए जनमानस भांपने की व्यापार गोष्ठी नाम की हमारी कोशिश में उम्मीदों से भी कई गुना ज्यादा रंग भरने के लिए देशभर के अपने पाठकों का आभार जताना चाहते हैं। इसकी अपार सफलता में नि:संदेह आपका ही शत-प्रतिशत योगदान है। हमें यकीन है कि इस मंच पर इसी तरह से जोरों-शोरों से आकर आप देश के करोंड़ों हिंदीभाषी लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लाए गए हिंदी में एक संपूर्ण आर्थिक समाचार पत्र की बिजनेस स्टैंडर्ड की मुहिम में यूं ही चार चांद लगाते रहेंगे।

First Published - July 8, 2008 | 12:46 AM IST

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