पिछले एक साल के दौरान देश ने तरल चिकित्सा ऑक्सीजन (एलएमओ), प्रेशर स्विंग एडजॉर्प्शन (पीएसए) संयंत्रों सहित अपनी समग्र ऑक्सीजन क्षमता बढ़ाकर 20,000 टन प्रतिदिन कर ली है। यह लगभग 20 गुना वृद्धि है। कोविड-19 की डेल्टा किस्म ने दूसरी लहर के दौरान जबरदस्त कहर बरपाया था और उस दौरान देश भर में ऑक्सीजन की किल्लत महसूस की गई थी।
अब संक्रमण के थमने के साथ ही ऑक्सीजन का अधिकांश बुनियादी ढांचा बेकार पड़ा है। उद्योग का अनुमान है कि चिकित्सा ऑक्सीजन की मौजूदा मांग 1,250 से 1,300 टन प्रति दिन (टीपीडी) है। ऐसे में पीएसए संयंत्रों को बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती है। जिन अस्पतालों में ऑक्सीजन की क्षमता बढ़ाई गई थी वे अब अपने बुनियादी ढांचे का अधिकतम उपयोग करने के तरीके तलाश रहे हैं।
क्षमता में वृद्धि
पहली लहर के दौरान (29 सितंबर, 2020 को) चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग 3,095 टन के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई थी। अप्रैल 2021 में चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग में जबरदस्त तेजी आई और वह पिछले साल अप्रैल के तीसरे सप्ताह में औसतन 5,500 टन प्रति दिन तक पहुंच गई। उस दौरान देश डेल्टा लहर की चपेट में था।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि अगस्त 2020 में दैनिक एलएमओ का उत्पादन लगभग 5,700 टन प्रति दिन था जिसे मई 2021 में बढ़ाकर 9,690 टन प्रति दिन कर दिया गया। इस्पात संयंत्रों में भी एलएमओ का उत्पादन बढ़ाया गया और 1,385 टन एलएमओ का आयात विभिन्न देशों से किया गया था। भारत ने अपने एलएमओ रोड टैंकरों में 36 फीसदी और परिवहन क्षमता में 58 फीसदी की वृद्धि की है। मंत्रालय ने बताया कि वर्तमान में देश में 2,540 एलएमओ टैंकर हैं जिनकी कुल क्षमता 34,588 टन है।
अस्पतालों में एलएमओ की भंडारण क्षमता में भी वृद्धि की गई। फिलहाल देश भर के अस्पतालों में 1,242 एलएमओ टैंक हैं जिनकी क्षमता 15,622 टन है। यह मार्च 2020 में कुल 6,759 टन क्षमता के साथ 609 टैंकों की तुलना में 104 फीसदी अधिक है। भंडारण क्षमता के लिहाज से यह 131 फीसदी की बढ़ोतरी है।
इसके अलावा देश भर के अस्पतालों में पीएसए संयंत्र स्थापित किए गए हैं। देश में कुल 4,135 पीएसए संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। इनमें केंद्र सरकार ने पीएमकेयर्स के तहत राज्यों को 1,225 संयंत्र स्थापित करने में मदद की।
अन्य 336 पीएसए संयंत्र भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के हैं। लगभग 2,574 पीएसए संयंत्र राज्य और सीएसआर फंडों के जरिये स्थापित किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि लगभग 4,125 पीएसए संयंत्र कुल 4,852 टन प्रति दिन क्षमता के साथ चालू हो चुके हैं और केवल 10 संयंत्र ही निर्माणाधीन हैं।
रखरखाव एवं उपयोगिता
ऑल इंडिया इंडस्ट्रियल गैस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एआईआईजीएमए) के अनुसार, भारत में चिकित्सा उपयोग के लिए ऑक्सीजन की मौजूदा मांग 1,250 से 1,300 टन प्रति दिन है।
एआईआईजीएमए के अध्यक्ष और डीपीआईआईटी द्वारा ऑक्सीजन समिति के सदस्य साकेत टीकू ने कहा कि पीएसए की खरीद में कुछ समस्याएं थीं। ऐसे में यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि कितने पीएसए चालू हैं।
टीकू की चिंता इस तथ्य पर आधारित है कि अस्पतालों में पीएसए संयंत्रों के खराब होने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पताल के एक अधिकारी ने पुष्टि की कि संयंत्र में खराबी के कई मामले सामने आए हैं।
उन्होंने कहा, ‘हमें खराबी को दूर करने के लिए वेंडरों से संपर्क करना पड़ा। बाद में संयंत्र बिना किसी व्यवधान के चालू है।’
पीएसए संयंत्रों के रखरखाव की जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की होती है। पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक सिद्धार्थ नियोगी ने कहा कि सभी संयंत्र परिचालन में थीं लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि रखरखाव में कुछ समस्याएं जरूर दिख रही हैं।
गुजरात में ऑक्सीजन उत्पादन उद्योग के एक सूत्र अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ‘कई सरकारी अस्पतालों ने इन पीएसए ऑक्सीजन संयंत्रों को मुफ्त में हासिल किया है। इन संयंत्रों के लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं करना पड़ा और इसलिए उन्हें रखरखाव की चिंता भी नहीं है। ऐसे में अधिकतर संयंत्र बेकार पड़े हैं। इसके अलावा, कई आयातित संयंत्र के कलपुर्जे उपलब्ध नहीं हैं जिससे रखरखाव में समस्या पैदा हो रही है।’
स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि 15 सितंबर, 2022 तक पीएसए संयंत्रों का परिचालन सुनिश्चित करने के लिए राज्यों द्वारा तीन मॉक ड्रिल पहले ही आयोजित किए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि एक अन्य मॉक ड्रिल इस महीने के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है।
निजी अस्पतालों में अधिकतम उपयोग की कोशिश
मुख्य तौर पर दो कारणों से निजी अस्पतालों रुख कहीं अधिक सतर्क रहा है। पहला, पीएसए ऑक्सीजन की गुणवत्ता एलएमओ के मुकाबले कम शुद्ध है और इसलिए वह गंभीर रोगियों के लिए उपयुक्त नहीं है। दूसरा, निजी अस्पताल खराब निवेश नहीं करना चाहते हैं।
दिल्ली के एक 100 से 120 बिस्तर वाले अस्पताल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि अब उनके पास एक पीएसए संयंत्र है। उसे सप्ताह में केवल एक बार चलाया जाता है ताकि मशीनों को दुरुस्त रखा जा सके।
मणिपाल अस्पताल के एमडी एवं सीईओ दिलीप जोस ने कहा, ‘हमारे सभी अस्पतालों में पर्याप्त भंडारण क्षमता है और हमें पीएसए ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। आमतौर पर हम 4 से 5 सप्ताह की आवश्यकताओं के लिए स्टॉक बरकरार रखते हैं और इसलिए रिफिल के लिए हमारे पास पर्याप्त समय होता है।’
फोर्टिस हेल्थकेयर ने कुछ स्थानों पर पीएसए संयंत्र स्थापित करने में निवेश किया है। अब वह संसाधन का अधिकतम उपयोग करने की कोशिश कर रही है। फोर्टिस हेल्थकेयर के समूह प्रमुख (चिकित्सा रणनीति एवं परिचालन) विष्णु पाणिग्रही ने कहा, ‘हम अपने मरीजों के लिए अपेक्षित सांद्रता हासिल करने के लिए एलएमओ के साथ पीएसए ऑक्सीजन का मिश्रण कर रहे हैं। यह एलएमओ पर हमारी निर्भरता को कम करता है जो अधिक महंगा है।’
अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज के एक सूत्र ने कहा कि पीएसए इकाइयों को जोड़ना उसके सभी अस्पतालों के लिए फायदेमंद साबित हुआ क्योंकि बाहरी स्रोतों से खपत में अब गिरावट आई है।
ऑक्सीजन विनिर्माता की नजर औद्योगिक मांग पर
चिकित्सा ऑक्सीजन बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी आईनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि कोविड-19 से पहले प्रमुख ऑक्सीजन उत्पादक 95 फीसदी से अधिक ऑक्सीजन औद्योगिक उपयोग के लिए आपूर्ति करते थे। अब दोबारा अधिकांश उत्पादन औद्योगिक उपयोग के लिए भेजा जा रहा है।
देश में प्रमुख ऑक्सीजन विनिर्माताओं में आईनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स, लिंडे इंडिया, अतुल ऑक्सीजन कंपनी, एम्स इंडस्ट्रीज, पीके कार्बोनिक्स और विनायक एयर प्रोडक्ट्स शामिल हैं।
एम्स इंडस्ट्रीज के निदेशक श्वेतांशु पटेल ने कहा, ‘चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग अब सामान्य हो गई है। इसने हमारे उद्योग को अधिक प्रभावित नहीं किया है क्योंकि औद्योगिक ऑक्सीजन की मांग ने उसकी भरपाई कर दी है।’