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सर्वोच्च न्यायालय ने मुफ्त उपहारों पर राजनीतिक दलों से चाहे सुझाव

Last Updated- December 11, 2022 | 5:05 PM IST

सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि केंद्र को अतार्किक मुफ्त उपहारों के मुद्दे के समाधान के लिए सुझाव देने की खातिर नीति आयोग, वित्त आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय विधि आयोग और भारत निर्वाचन आयोग की राय लेनी चाहिए। अदालत ने देश में मुफ्त रेवड़ियों की संस्कृति के खिलाफ दायर याचिका पर यह पहल की है। 

इस याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि चुनावों से पहले सार्वजनिक धन से अतार्किक मुफ्त उपहार बांटने या उनका वादा करने वाले राजनीतिक दलों को मंजूरी नहीं दी जाए और ऐसा करने वाले राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द होना चाहिए। 

याची की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि सरकारी खजाने पर 60,000 करोड़ रुपये के कर्ज पर विचार किया जाना चाहिए। सरकार की तरफ से पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह याची के विचारों का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, ‘लोक-लुभावन योजनाएं मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित करते हैं। इस रास्ते के जरिये हम आर्थिक आपदा की तरफ बढ़ रहे हैं।’

उन्होंने सुझाया कि चुनाव आयोग को इस मामले पर विचार के लिए अपना विवेक इस्तेमाल करना चाहिए। अदालत ने इस सुझाव पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि अगर चुनाव आयोग इस मुद्दे पर विचार नहीं करना चाहता है तो वह उसे ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है। 
चुनाव आयोग की तरफ से पेश वकील ने कहा कि वह अपना जवाब पहले ही दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि मुफ्त उपहारों के ऐसे नियमनों को आचार संहिता में शामिल किया जा सकता है। 

न्यायालय ने 19 साल पहले के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने कुछ नहीं किया है। अदालत ने कहा, ‘इससे वंचित लोगों को लाभ मिलते हैं और ऐसा नहीं है कि धनी लोगों को ऐसे लाभों से वंचित किया जाता है।’

अदालत ने पाया है कि आचार संहिता के जरिये मुफ्त उपहारों का नियमन करना व्यवहार्य नहीं है। अदालत ने कहा, ‘चुनावों से ठीक पहले आचार संहिता लागू होती है। आचार संहिता लागू होने से चार साल पहले का कोई हिसाब नहीं होता है।’

केंद्र से असहमति जताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता और राजनेता कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले से दूर रखा जाना चाहिए क्योंकि यह आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा है। सिब्बल ने सुझाव दिया, ‘इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होनी चाहिए।’

अदालत ने इस चर्चा पर चिंता जताते हुए कहा कि इन दिनों हर कोई मुफ्त की चीजें चाहता है। अदालत ने सुझाव दिया कि सभी भागीदार मिलकर विचार करें और अपने सुझाव दें। अदालत ने कहा, ‘ये राजनीतिक मामले हैं। वित्त आयोग, राजनीतिक दलों, विपक्षी दलों और अन्य भागीदार चर्चा कर अपने सुझाव तैयार करें और अपनी रिपोर्ट पेश करें।’ अदालत ने सभी दलों को एक संस्था के गठन के बारे में सुझाव देने का निर्देश दिया, जो इस मामले की जांच के लिए अदालत द्वारा गठित की जा सकती है। न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई 8 अगस्त को करेगा। 
 

First Published - August 4, 2022 | 12:11 PM IST

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