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हींग के दाम पर तालिबान का असर

Last Updated- December 11, 2022 | 4:22 PM IST

दिल्ली में चांदनी चौक के पास खारी बावली को एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी कहा जाता है। आम भारतीय रसोई में मिलने वाले तमाम मसालों का यहां जमकर कारोबार होता है। इस मंडी में हींग के भाव पिछले दो साल में करीब 30 फीसदी चढ़ गए हैं और इसकी वजह तालिबान हैं। चौंकिए मत। भारत में सबसे ज्यादा हींग अफगानिस्तान से आती है और वहां तालिबान का कब्जा होने के बाद से आयात काफी बिगड़ा है।

खारी बावली में हींग का व्यापार करने वाले सिद्धार्थ बत्रा कहते हैं, ‘अफगानिस्तान से हींग का आयात धीमा पड़ा है और तालिबान के कब्जे के बाद पिछले एक साल में तो यह बहुत कम हो गया है। हालांकि अब वहां से हींग आना शुरू हो गई है मगर मांग के हिसाब से आवक नहीं हो रही है।’

भारतीय व्यंजन तीखे मसालों के बिना अधूरे हैं और हींग इनमें खास है। हम सदियों से हींग का इस्तेमाल करते आए हैं मगर इसका उत्पादन भारत में कभी नहीं हो पाया है क्योंकि इसके पौधे ठंडी और बिना नमी की जलवायु में ही फलते हैं। इसीलिए भारत में करीब 85 फीसदी हींग अफगानिस्तान से आती है। इसके अलावा उज्बेकिस्तान, ईरान और कजाकिस्तान जैसे देशों से भी इसका मामूली आयात होता है।

अफगानिस्तान की सत्ता तालिबान के हाथ आने के एक साल बाद इस पड़ोसी देश के साथ भारत का व्यापार धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है। पिछले साल अगस्त में जब तालिबान ने खूनखराबे के बगैर सत्तापलट कर लगाम अपने हाथ में ली थी तो भारत से अफगानिस्तान को निर्यात एकदम घटकर 2.4 करोड़ डॉलर रह गया था। इस साल जून में यहां से 4.8 करोड़ डॉलर के माल का निर्यात हुआ। वहां से आयात के आंकड़े हर महीने अलग-अलग रहे हैं और जून में कुल 2.79 करोड़ डॉलर का आयात हुआ, जिसमें 67 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी (1.76 करोड़ डॉलर) हींग की है।

अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात तथा ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों में भी हींग की बहुत मांग है और भारत आयात की हुई हींग को प्रसंस्करण के बाद इन देशों में निर्यात कर देता है। पिछले वित्त वर्ष में भारत ने 10.4 करोड़ डॉलर की हींग का आयात किया और प्रसंस्करण के बाद 1.25 करोड़ डॉलर की हींग का निर्यात किया।

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि पाकिस्तान के रास्ते तालिबान भारत को और ज्यादा माल निर्यात करना चाहता है। उन्होंने कहा, ‘अगर हमने पाकिस्तान को उसका माल मध्य एशियाई देशों तक भेजने दिया है तो हम भी पाकिस्तान के रास्ते अपना माल भारत को भेज सकते हैं।’

भारत ने तालिबान सरकार को अभी तक मान्यता नहीं दी है मगर काबुल में पिछले साल अगस्त में बंद किया अपना दूतावास जून में फिर खोल दिया है। वह अफगानिस्तान को मानवीय सहायता भी मुहैया कराता रहा है। शनिवार को विदेश मंत्रालय ने कहा कि मानवीय सहायता अभियान के तहत भारत ने चिकित्सा सहायता की दसवीं खेप भेज दी है। मंत्रालय ने कहा कि अफगानों की तत्काल मदद की संयुक्त राष्ट्र की अपील को मद्देनजर रखते हुए भारत ने अब तक 10 खेपों में 32 टन चिकित्सा सामग्री भेजी है, जिसमें आवश्यक जीवनरक्षक दवाएं, टीबी रोधी दवाएं, कोविड टीके की 5 लाख खुराक आदि शामिल हैं। यह सामग्री विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंदिरा गांधी चिल्ड्रन हॉस्पिटल, काबुल को दी गई है।

लोकसभा में मॉनसून सत्र के दौरान सवाल किया गया था कि भारत सरकार अफगानिस्तान में भारी मात्रा में मौजूद लीथियम हासिल करने के लिए क्या अफगानिस्तान सरकार के साथ द्विपक्षीय व्यापार संधि करना चाहती है। विदेश मंत्रालय ने अपने जवाब में ऐसे किसी भी प्रस्ताव से इनकार किया था। उसने कहा, ‘अफगानिस्तान के साथ ऐसे द्विपक्षीय व्यापार समझौते का कोई प्रस्ताव नहीं है।’

इस बीच भारत ने देश में ही हींग उत्पादन की कोशिश शुरू कर दी है। सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स, पालमपुर के वैज्ञानिक हिमालय में हींग उगाने के मिशन में जुटे हैं। हींग का पहला पौधा 2020 में हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में स्थित क्वारिंग गांव में लगाया गया है। हींग पौधे की जड़ों से मिलती है और पौधा लगाने के बाद हींग बनने में करीब पांच साल लग जाते हैं।

अलबत्ता अफगानी हींग का कोई जोड़ नहीं है। खारी बावली के हींग कारोबारी लाल मणि गोस्वामी कहते हैं, ‘जब पहली बार हींग की कटाई की जाएगी तो बढ़िया हींग नहीं मिलेगी। इसकी गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है मगर अफगानी हींग जैसी गुणवत्ता हासिल करना मुश्किल होगा।’

First Published - August 23, 2022 | 10:35 PM IST

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