ताज नगरी आगरा का हस्तशिल्प उद्योग पिछले कुछ दशकों से प्रौद्योगिक प्रगति के पूर्णतया अभाव के कारण अपने प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ता जा रहा है।
इस मुगलकालीन शहर के कुल निर्यात में हस्तशिल्प उद्योग की भागीदारी तकरीबन 25 फीसदी की है और यह परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार मुहैया कराता है।
शहर में पेशेवर स्तर के हस्तशिल्प प्रशिक्षण संस्थानों के विकास की अवधारणा को लेकर सरकार की कथित उदासीनता और इस उद्योग के लिए निर्यात प्रोत्साहनों का अभाव भी अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प कारोबार के मोर्चे पर इस उद्योग के पिछड़ने का मुख्य कारण है।
इस उद्योग से जुड़े जानकारों के मुताबिक आगरा हस्तशिल्प उद्योग हर साल विभिन्न श्रेणियों में 500 करोड़ रुपये के हस्तशिल्प उत्पादों का निर्यात करता है। इन श्रेणियों में संगमरमर और अन्य पत्थरों, जरदोजी, कांच, चटाई आदि की जड़ाई का काम शामिल है।
लेकिन सरकार द्वारा दिए जाने वाले प्रोत्साहनों के संदर्भ में बात करें तो हस्तशिल्प निर्माताओं और एम्पोरियमों को राज्य सरकार की तरफ से केवल वीकली मार्केट क्लोजर्स से छूट दी जाती है।
इसके अलावा सिर्फ पर्यटकों को हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया जाता है। हस्तशिल्प निर्यातकों के लिए कभी भी निर्यात केंद्रित सुविधाओं की घोषणा नहीं की गई है।
यूपी हैंडीक्राफ्ट्स डेवलपमेंट सेंटर के चेयरमैन प्रहलाद अग्रवाल ने दावा किया कि आगरा में हस्तशिल्प निर्माताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्रौद्योगिकी विश्व में अन्य हिस्सों में इस्तेमाल की जाने वाली प्रौद्योगिकी से दशकों पीछे है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आगरा के हस्तशिल्प उत्पादों को पैठ बढ़ाने में इसलिए भी नाकामी मिल रही है क्योंकि पुराने जमाने के उपकरणों के कारण कारीगरों को काम करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और ये निर्यातक हाथ में आए बड़े ठेकों को समय पर पूरा करने में विफल रहते हैं।
इसके परिणामस्वरूप इस शहर के कालीन और जरदोजी निर्माताओं को मिलने वाले ऑर्डर इनके हाथ से निकल कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में इनके समकक्षों की झोली में जा रहे हैं। इसी तरह कांच हस्तशिल्प उद्योग को चीन से कड़ी चुनौती मिल रही है।
संगमरमर हस्तशिल्प की दशा फिलहाल कुछ बेहतर है। ताज महल प्रतिकृतियों के निर्माण और जरदोजी कार्य को लेकर संगमरमर हस्तशिल्प उद्योग का दबदबा कायम है, लेकिन पत्थरों पर नक्काशी का व्यवसाय कई कारकों की वजह से गिरावट के दौर से गुजर रहा है।
इन कारणों में शहर में बिजली की किल्लत और पत्थर पर वैट का लगाया जाना आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं।
अग्रवाल के मुताबिक कारीगर स्वयं अपने उत्तराधिकारी यानी वारिस को इस इस कारीगरी से प्रशिक्षित करते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के हस्तशिल्प कारीगर अपने पूर्वजों द्वारा सिखाई गई प्राचीन विधि का ही इस्तेमाल करते हैं।
वे नई तकनीक को सीखना पसंद नहीं करते। उन्होंने कहा कि स्थानीय हस्तशिल्प उद्योग ने इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार को एक आधुनिक हस्तशिल्प प्रशिक्षण संस्थान खोलने का सुझाव दिया है ताकि इस व्यवसाय में नई हस्तशिल्प प्रतिभाओं को विकसित किया जा सके। लेकिन इस सुझाव पर सरकार की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
मार्बल एम्पोरियम के अधिकारी दिनेश बंसल ने का कहना है कि आगरा के संगमरमर एवं स्टोन हस्तशिल्प उद्योग के निर्यात आधारित उद्योग में तब्दील होने की असीम संभावनाएं हैं, लेकिन इस उद्योग के विकास को लेकर सरकार उदासीनता बरत रही है।
उन्होंने कहा कि स्टोन हस्तशिल्प निर्यात पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार से निर्यात प्रोत्साहनों की मांग कर रहे हैं, लेकिन इन निर्यातकों को किसी तरह का प्रोत्साहन नहीं दिया गया है।
उन्होंने बताया कि स्थानीय निर्यातक चीन जैसे देशों के निर्यातकों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं। यदि स्थानीय हस्तशिल्प उद्योग को निर्यात आधारित प्रोत्साहन दिए जाते हैं तो उसे चीनी निर्यातकों से मुकाबला करने में मदद मिलेगी। फिलहाल अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में चीनी निर्यातक छाए हुए हैं।