एक तो करेला, उस पर नीम चढ़ा…रियल एस्टेट सेक्टर के लिए कुछ ऐसी मगर इससे इतर कोई और कहावत तलाशनी पड़ेगी।
क्योंकि यह तो हर आम आदमी जानता है कि घर का बनाना कोई आसां काम नहीं मगर इस मुश्किल काम वाले करेले के ऊपर सिर्फ एक नीम ही नहीं बल्कि कई और कड़वी हकीकतों का रंग इन दिनों चढ़ा नजर आ रहा है।
मसलन, ऊंची ब्याज दरें, स्टील, सीमेंट जैसी मकान के लिए जरूरी चीजों के आसमान छूते दाम, डिमांड से कई गुना ज्यादा सप्लाई…। हालत यह है कि अब इस सेक्टर का करेला आम आदमी तो एक तरफ, खुद बिल्डरों-प्रॉपर्टी डीलरों के गले ही नहीं उतर पा रहा है।
महज साल-दो साल पहले तक दोनों हाथों से मलाई काटने में लगे बिल्डर-प्रॉपर्टी डीलर फिलहाल तेजी के इस बुलबुले के फूटने से ढहती रियल एस्टेट की बुलंद इमारत से ही जान बचाने की जुगत में लगे हैं। जाहिर है, मोटी रकम झोंककर मलाई काटने का सिलसिला खत्म होते ही कइयों के लिए तो यह निवेश अब जी का जंजाल बन चुका है। और यह हालत किसी एक शहर या महानगर तक ही नहीं है बल्कि कमोबेश पूरे देश में रियल एस्टेट पर मंदी का पंजा कसता जा रहा है।
बाजार विशेषज्ञ बताते हैं कि देश के प्रमुख शहरों के मुख्य व्यावसायिक स्थानों में प्रॉपर्टी की कीमत पिछले तीन से छह माह के बीच या तो लगभग न के बराबर बढ़ी है या फिर इसमें 10 फीसदी तक की गिरावट आई है। खरीदार मौन साध कर घरों में बैठे हैं।
उस पर तुर्रा यह है कि अगले छह से आठ माह के बीच इन इलाकों में कई नए निर्माण भी पूरे होने वाले हैं। यानी खरीदार नदारद, सप्लाई ज्यादा, लागत सामग्री पर महंगाई की मार, दामों में गिरावट या स्थिर …नतीजा क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना बस दो और दो चार जोड़ने जैसा काम ही रह जाता है।इन्हीं हालात के मद्देनजर, कई विशेषज्ञों का मानना है कि कई प्रमुख शहरों के मुख्य व्यावसायिक इलाकों में दामों में अभी 10 से 15 फीसदी की और गिरावट आएगी।
मुंबई में तो इस क्षेत्र की मंदी का आलम यह है कि हाल ही में बांद्रा-कुर्ला कॉम्पलेक्स के दो प्लॉटों के लिए बोली लगाने ही कोई नहीं पहुंचा। इसी तरह, रिहाइशी संपत्ति में निवेश करना भी इन बिल्डरों के लिए खासा सिरदर्द साबित हो रहा है। ब्याज दरों के बढ़ने और प्रॉपर्टी के दामों में पिछले साल तक आई बुलंदी देखकर होम लोन लेने वालों की तादाद तेजी से घटी है।
खरीदारों की बेरुखी के चलते ही मुंबई में अपार्टमेंट की बिक्री 20 से 30 फीसदी तक घट गई है। महानगरों में तो गधे के सिर से सींग हो चुके खरीदारों को वापस बुलाने के लिए बिल्डर-डेवलपर स्टांप डयूटी में छूट, फ्री पार्किंग जैसे प्रलोभन देने की होड़ में लगे हुए हैं। वैसे इन हालात में लोगों के जेहन में यह सवाल भी उठता है कि अगर प्रॉपर्टी के बाजार की हालत इतनी ही खस्ता है तो मकान-दुकान या ऑफिस स्पेस की कीमतों में कमी क्यों नहीं हो रही।
विशेषज्ञों की नजर में इसका भी बड़ा दिलचस्प कारण है। वह यह कि ऊंची कीमतों का ऐलान कर चुके डेवलपर कीमतें इसलिए कम नहीं कर रहे क्योंकि एक बार उन्होंने ऐसा कर दिया तो बाजार की बदहाली सार्वजनिक हो जाएगी और फिर कीमतों के लुढ़कने का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।
लिहाजा बदहाली के ऊपर ऊंची कीमतों की चादर लगाकर वह इस उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं कि शायद जल्द ही हालात सुधर जाएं और हरियाली के दिन वापस लौट आएं। कुछ ऐसी ही ऊहापोह में खरीदार भी हैं। उनका मानना है कि जल्द ही कीमतों में मंदी का दौर शुरू होगा और तब वह फिर से इस क्षेत्र का रुख करेंगे।
बहरहाल, दोनों की यह आस भले ही एक-दूसरे की विरोधाभासी हो और इनमें से किसकी आस पूरी होगी, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तो साफ है कि नींव दरकने से फिलहाल प्रॉपर्टी बाजार थरथरा रहा है।
इस बार की व्यापार गोष्ठी में खरीदारों, बिल्डरों, प्रॉपर्टी डीलरों और विशेषज्ञों की राय लेकर बिजनेस स्टैंडर्ड ने इसी थरथराहट को भांपने की पुरजोर कोशिश की। इनके बीच हुई यह व्यापार गोष्ठी क्या रंग लाई, इसका नतीजा तो आपको व्यापार गोष्ठी पर इनके विचारों से रूबरू होकर ही मिल सकेगा।