आसमान छूती महंगाई दर ने तेल के बाजार में काफी खेल खिलवाया। जाहिर है, खिलाड़ी कारोबारी रहे।
लेकिन तिलहन की खेती से बाजार तक तेल की धार पहुंचाने वाले किसानों तक मुनाफे के इस खेल की मलाई पहुंची या नहीं? देश के प्रमुख बाजारों में बिज़नेस स्टैंडर्ड द्वारा की गई इस मुद्दे पर गहन पड़ताल के बाद पेश है तिलहन किसानों पर यह खास रपट
पंजाब और उत्तर प्रदेश में सरसों की उपज लगातार कम होती जा रही है, वहीं सरकार की ओर से खाद्य तेलों पर आयात शुल्क खत्म कर देने से किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिल पा रही है। उत्तर प्रदेश स्थित श्रावस्ती जिले के बबनजोत गांव के करम सिंह का कहना है कि इस साल महंगाई बढ़ने से खाद्य तेलों की कीमतों में भी उछाल आया है, लेकिन आयात शुल्क में छूट देने से इसकी कीमत फिर से कम हो गई है।
लखनऊ व्यापार मंडल के महासचिव चंद्र कुमार छाबड़ा का कहना है कि वित्त मंत्री की ओर से आयात शुल्क खत्म कर देने से तेल की कीमतों में कमी आई है। कुछ हफ्ते पहले जहां सरसों तेल खुदरा बाजार में 90 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वहीं यह घटकर 64 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है।
सरसों और तिलहन के प्रमुख उत्पादक राज्य हरियाणा के हफेड (हरियाणा मार्केट फेडरेशन) का कहना है कि चालू सीजन में सरसों 23,000 से 24,00 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर बेचा जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि प्राइवेट मिल मालिक न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा कीमत पर सरसों खरीद रहे हैं, इसलिए हफेड सरकारी एजेंसी नफेड के लिए खरीदारी नहीं कर रहा है।
हफेड के एमडी सुधीर राजपाल का कहना है कि हफेड अपनी जरूरतों के लिए भी बाजार मूल्य पर ही सरसों खरीद रहा है। सरकार ने तकरीबन सभी तिलहनों के लिए खरीद मून्य 1500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि बाजार में इससे कहीं ज्यादा कीमत मिल रही है।
उधर, अच्छी कीमत नहीं मिलने से किसानों ने तिलहन उत्पादन पर ध्यान देना कम कर दिया है, जिससे इसके उत्पादन में लगातार कमी आ रही है। उत्तर प्रदेश में 2005-06 में जहां 6.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर सरसों की खेती की गई थी, वही 2006-07 में यह घटकर 5.99 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसकी वजह से उत्पादन पर भी असर पड़ा है। 2005-06 में 7.20 लाख मीट्रिक टन की पैदावार हुई थी, जो वर्ष 2006-07 में घटकर 6.12 लाख मीट्रिक टन तक रह गई।
तिलहन की कुल पैदावार की बात करें, तो वर्ष 2005-06 में जहां 8.78 लाख मीट्रिक टन की पैदावार हुई थी, वहीं यह 2006-07 में घटकर 7.49 लाख मीट्रिक टन रह गई है। खाद्य वनस्पति तेल के उत्पादन में भी गिरावट आई है।
वर्ष 2005-06 में देशभर में 37 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था, जो 2006-07 में घटकर 32.8 मिलियन टन रह गया है, जबकि वर्ष 2004-05 में 5.64 मिलियन टन खाद्य तेल का आयात किया गया, वहीं 2005-06 में 5.43 मिलियन टन और 2006-07 में 5.80 मिलियन टन तेल का आयात किया गया।
फोरम फॉर बॉयोटेक्नोलॉजी एंड फूड सिक्यूरिटी के कृषि विशेषज्ञ भास्कर गोस्वामी ने कहा कि सरकार ने तेल के लिए जो रणनीति तैयार की थी, उसे खुद ही नष्ट कर रही है। 1980 में सरकार ने ऑयल सीड टेक्नोलॉजी मिशन की शुरुआत की थी, जिससे 1993 में देश तिलहन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो गया। उसके बाद सरकार ने 1993 में किसानों से खरीदारी बंद कर आयात को बढ़ावा देना शुरू कर दिया।
पंजाब की बात करें, तो यहां भी तिलहन उत्पादन में कमी आई है। वर्ष 2005-06 में 0.82 लाख हेक्टेयर में तिलहन की फसल बोई गई थी, जो 2006-07 में घटकर 0.70 लाख हेक्टेयर रह गई। स्थानीय किसानों का कहना है कि सरकार की ओर सरसों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1715 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि व्यापारी इससे 300 से 400 रुपये ज्यादा दे रहे हैं।
कृषि आयोग के कॉस्ट एंड प्राइस के पूर्व अध्यक्ष टी. हक का कहना है कि सरकार को तेल नीति में जल्द सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए एक ऐसी तकनीक विकसित करनी चाहिए, जिससे उत्पादकता में वृद्धि हो। साथ ही सरकार की ओर से तिलहन की कीमत में सुधार लाने पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही आयात शुल्क को दुरुस्त करना चाहिए, जिससे घरेलू उत्पादकों को नुकसान न हो।