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चमड़ी में अब नहीं बची वह दमड़ी

Last Updated- December 07, 2022 | 8:47 PM IST

दुनिया में मशहूर कानपुर का चमड़ा उद्योग इस शहर की बुनियादी ढांचागत समस्याओं से अछूता नहीं है।


चमड़ा कारोबारियों का पलायन रोकने की सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद इस उद्योग को कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है।

कानपुर शहर 350 से अधिक छोटी और बड़ी चमड़ा इकाइयों का गढ़ है। यह उद्योग हर साल कर के रूप में 2000 करोड़ रुपये से अधिक चुकाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार मंदी और कच्चे माल की कीमतों में इजाफा पहले ही इस उद्योग की कमर तोड़ चुका है।

ब्याज दर में छूट को वापस लिए जाने की धमकी ने छोटे कारखानों के मालिकों को और अधिक भयभीत कर दिया है। उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की ओर से बढ़ रहे नियामक दबाव, बिजली की किल्लत और स्थानीय सरकार के अधिकारियों द्वारा कथित वसूली जैसे स्थानीय कारकों के कारण पिछले दो वर्षों में 65 से अधिक छोटे कारखाने बंद हो चुके हैं।

समस्याओं से जूझ रहे ये कारखाना मालिक बिहार जाने पर विचार कर रहे हैं। इन कारखाना इकाइयों को कर छूट जैसे प्रोत्साहनों के अलावा मिस्र और इथियोपिया जैसे अफ्रीकी देशों से मुफ्त जमीन दिए जाने के भी संकेत मिले हैं।

जूता उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले फॉर्मिक एसिड और डाई की किल्लत हो गई है। इन फॉर्मिक एसिड और डाई का चीन से आयात किया जाता रहा है। चर्मशोधन की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले बेसिक क्रोमियम सल्फेट (बीसीएस) की कीमतों में 150 फीसदी का इजाफा हुआ है।

कानपुर से चमड़ा उत्पादों का निर्यात करने वाले ताज आलम ने बताया, ‘पिछले कुछ महीनों में हमारे निर्यात में मामूली गिरावट आई है, लेकिन हम इसे अस्थायी मान रहे हैं।’ हाल ही में संपन्न हुए पेइचिंग ओलंपिक के दौरान सख्त पर्यावरण मानकों के कारण कारखानों में रोजाना काम करने वाले तकरीबन 15000 श्रमिकों को नुकसान हुआ है। इधर कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। भारत के चमड़ा उत्पाद निर्माता इस स्थिति से उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ओलंपिक समाप्त हो जाने पर अब उन्हें स्थिति में सुधार आने की उम्मीद है।

ऑल इंडिया स्किन ऐंड हाइड टैनर्स ऐंड मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एम. रफीक अहमद ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि शोधित किए गए चमड़े पर निर्यात शुल्क समाप्त किया जाए क्योंकि इसे एक विशेष प्रक्रिया के तहत तैयार किया जाता है।’ उन्होंने कहा कि कारखानों की संख्या पहले ही घट कर लगभग आधी रह गई है और यदि  नीति में बदलाव नहीं लाया गया तो कई और कारखाने बंद हो जाएंगे।

वैसे चमड़ा उत्पादन स्तर (कुल घरेलू उत्पादन का 50 फीसदी) यहां काफी ऊंचा है। घरेलू बाजार भी बेहद अच्छा है। देश ने पिछले साल 2 अरब वर्ग फुट चमड़ा का उत्पादन किया था और 2010-11 तक इसका निर्यात बढ़ कर तकरीबन 300 अरब रुपये तक पहुंच जाने की संभावना है।

हालांकि प्रशासन ने इस उद्योग के महत्व को पहचाना है और मौजूदा एवं अतिरिक्त बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए 912 करोड़ रुपये का पैकेज तैयार किया है।

First Published - September 12, 2008 | 12:34 AM IST

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