दिल्ली के सियासी हलकों में उथल-पुथल का असर अगर सबसे ज्यादा कहीं दिख रहा है, तो वह उत्तर प्रदेश ही है।
वह यूं कि संप्रग सरकार पर आए संकट के बादल से सबसे ज्यादा प्रभावित प्रदेश भी उत्तर प्रदेश ही होने वाला है। पहली बानगी तो तब देखने को मिली, जब राजनीतिक खींचतान शुरू होते ही देश के बड़े उद्योगपतियों को अपने पाले में खींचने की यूपी सरकार की कवायद भी धरी की धरी रह गई।
प्रदेश सरकार ने सोमवार को उद्यमियों की बैठक दिल्ली में बुलाकर उन पर डोरे डालने की सोची थी। बैठक केंद्र की राजनीति में आए भूचाल के कारण रद्द हो गई है। अब नए सिरे से बैठक की तारीख तय होगी और योजनाएं बनेंगी। अस्थिरता का असर प्रदेश की नौकरशाही पर भी साफ दिख रहा है। एक दर्जन से ज्यादा आईएएस अधिकारी बीते पांच दिनों में केंद्र पर प्रतिनियुक्ति पर अर्जी लगा चुके हैं।
लालफीताशाही के चलते छह दर्जन से ज्यादा पीसीएस अफसरान आईएएस कैडर में आने की बाट जोह रहे हैं। राजनीतिक हलकों की हालिया उथल-पुथल का असर बहुजन समाज पार्टी के मिशन- दूसरों को तोड़ो- पर पड़ा है। पहले जहां लगभग हर हफ्ते बसपा कम-से-कम एक प्रमुख नेता को दूसरी पार्टी से तोड़ रही थी, वहीं अब इस रफ्तार पर अंकुश लगा है।
हाल ही में सपा से बसपा में आकर राज्यमंत्री का दर्जा पाने वाले मलिहाबाद के विधायक गौरीशंकर ने विधायकी से इस्तीफा नहीं दिया। यहीं हाल सपा सांसद मुन्नवर हसन का है, जो परमाणु मुद्दे पर बसपा के पाले में खड़े तो हो गए हैं, पर इस्तीफा अब तक नहीं दिया है। केंद्र की हालत को देखकर उप्र की सरकार इतने सकते में है कि मानसून सत्र की तारीख तक तय नहीं कर पाई है। सोमवार को सीबीआई की चार्जशीट दाखिल होने के बाद प्रेस कांफ्रे न्स करने वाले बसपा महासचिव फोन पर उपलब्ध नहीं थे, जबकि प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य का मोबाइल आउट ऑफ रीच था।