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आखिर क्यों भारत फलों और सब्जियों के बाजार का है मामूली खिलाड़ी

Last Updated- December 11, 2022 | 3:22 PM IST

भारत विश्वभर में आम, केला, आलू तथा प्याज जैसे फलों और सब्जियों का प्रमुख उत्पादक है। लेकिन जब बात निर्यात या वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी की आती है तो इसमें भारत बहुत पीछे है।     
खाद्य एवं कृषि संगठन के 2020 के आंकड़ों पर आधारित कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के एक आकलन के अनुसार विश्वभर में भारत केले (26.29 फीसदी), पपीता (43.26 फीसदी) और आम के उत्पादन में 45.14 फीसदी के साथ पहला स्थान रखता है।  
सब्जियों की बात करें तो अदरक और भिंडी के उत्पादन में भारत पहले स्थान पर है। आलू, प्याज, फूलगोभी, बैगन तथा पत्ता गोभी आदि के उत्पादन में विश्व में दूसरा स्थान रखता है। लेकिन सब्जियों और फलों के वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी महज 1 फीसदी के आस-पास है।  एपीडा के आकलन में बताया गया हैं कि फलों और स​​ब्जियों की विशाल उत्पादन क्षमता भारत को निर्यात के लिए सुनहरा अवसर प्रदान करती है। वर्ष 2021-22 में भारत ने 11,412.50 करोड़ रुपये के फलों और सब्जियों का निर्यात किया था। जिसमें फलों की हिस्सेदारी 5,593 करोड़ रुपये और सब्जियों की हिस्सेदारी 5,745.54 करोड़ रुपये की थी। फलों के निर्यात में अंगूर, अनार, आम, केले और संतरे की बड़ी हिस्सेदारी है। इसी तरह से सब्जियों के निर्यात में आलू, प्याज, टमाटर और हरी मिर्च की हिस्सेदारी अधिक है। 
भारत से ताजे फलों और सब्जियों का सबसे अधिक निर्यात संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, नीदरलैंड, मलेशिया, श्रीलंका, ब्रिटेन, ओमान और कतर को होता है। वहीं प्रसंस्कृत फलों और सब्जियों का सबसे अधिक निर्यात अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, चीन, नीदरलैंड, ब्रिटेन और सऊदी अरब को होता है।
भारत से फलों और सब्जियों का निर्यात करने वाले देशों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि नीदरलैंड और ब्रिटेन को छोड़कर, भारत के ताजे फल और सब्जियों का निर्यात बड़े पैमाने पर पड़ोसी देशों या आसपास के देशों को हुआ है। ऐसा होने के वैध कारण भी हैं।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सुधार के बावजूद अभी भी भारत अंतिम खरीदार तक ताजा फलों और सब्जियों को पहुंचाने के लिए सुदृढ़ और विशाल कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क बनाने में, वातानूकुल यातायात व्यवस्था और अन्य जरूरी इंतजाम करने में विश्व के प्रमुख फल और सब्जी उत्पादक देशों से काफी पीछे है।   
उत्पादन के बाद का घाटा
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा वर्ष 2015 में भारत में खाद्य हानि का मूल्यांकन करने के लिए आईसीएआर के केंद्रीय फसल कटाई उपरांत इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईपीएचईटी) को एक अध्ययन सौंपा गया था। इस अध्ययन से पता चलता है कि फसल की कटाई के बाद अनाज में हुई हानि 4.65 फीसदी से 5.99 फीसदी के बीच थी। तिलहन और दालों में हानि 3.08 फीसदी से 9.96 फीसदी के बीच थी। मसालों में हानि 1.18 फीसदी से 7.89 फीसदी के बीच थी। पशुधन उत्पाद (दूध, मांस और सब्जियों) में हानि 0.92 फीसदी से 10.52 फीसदी के बीच थी और फलों तथा सब्जियों में हानि 4.58 फीसदी से 15.88 फीसदी के बीच थी।  लघु किसान कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (एसएफएसी) द्वारा 29 वस्तुओं के समूह का मूल्यांकन करने के लिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा के खेतों में भ्रमण पर आधारित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि नाशपाती के मामले में सबसे ज्यादा नुकसान 22-44 फीसदी हुआ था और तरबूज के मामले में सबसे कम 7-11 फीसदी नुकसान हुआ था। 
क्या कहते हैं विश्लेषक?
राष्ट्रीय कोल्ड चेन विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्याधिकारी पवनेक्स कोहली कहते हैं, ‘पहाड़ों पर उगने वाले सेब और नाशपाती को छोड़कर लगभग सभी फलों और सब्जियों की ब्रिकी अवधि बहुत कम दिनों की होती है। जबकि कुछ फलों के मामले में ऑक्सीजन स्तर को कम करके उनकी ब्रिकी अवधि 16-18 महीनों तक बढ़ाई जा सकती है। हालांकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगने वाले फलों जैसे केले और आम की ब्रिकी अवधि अच्छे से अच्छे कोल्ड स्टोरेज में भी कुछ सप्ताह से अधिक नहीं होती है। इसलिए फलों और सब्जियों को खेत से प्लेट तक पहुंचने में लगने वाले समय को कम करना होगा। जो केवल खेतों के पास पैक हाउस बनाकर और त्वरित तथा कुशल परिवहन के लिए रीफर वैन आदि के प्रयोग के माध्यम से ही हो सकता है।    
कोहली ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उगने वाले फल जैसे कि आम को मंडी से खरीदकर आप निर्यात नहीं कर सकते हैं। क्योंकि आम जब तक मंडी में पहुंचता है तब तक उसकी ब्रिकी अवधि 15 दिन तक कम हो गई होती है। आम की ब्रिकी अवधि लगभग चार सप्ताह तक होती है। ऐसी स्थिति में निर्यातक के पास इसे पड़ोसी देशों को बेचने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं होता है। कोहली कहते हैं, ‘इसी कारण से अमेरिका और यूरोप के विशाल और लाभकर बाजार हमारी पहुंच से दूर रह जाते हैं।’
यहां तक कि किसानों की आय दोगुनी करने पर केंद्र के उच्चाधिकार प्राप्त पैनल (डीएफआई) ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस समस्या का जिक्र किया था। इसमें कहा गया है कि खराब होने वाली उपज के मामले में विपणन योग्य जीवनचक्र दबाव में रहता है और कोल्ड स्टोरेज के अभाव में खाद्य गुणवत्ता में तेजी से कमी आती है। 
पैनल ने कहा, ‘कोल्ड-चेन की कमी किसानों को खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और अक्षम थोक बाजारों में अपनी फसल को बेचने के लिए मजबूर करती है। किसानों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता है। यह किसानों को सशक्त भी नहीं करती है।’ 
 कोल्ड-चेन और अन्य संसाधन 
वर्ष 2015 में एनसीडीडी द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में खराब होने वाली वस्तुओं के परिवहन के लिए आवश्यक आधुनिक भंडारण बुनियादी ढांचे की कमी है। इसने कहा कि जब एकीकृत पैक हाउसों की बात आती है तो पैक हाउस की 99.6 फीसदी और रीफर वैन की 85 फीसदी कमी है। केवल कोल्ड स्टोरेज (थोक और हब दोनों) के मामले में कुछ स्थिति अच्छी थी लेकिन खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह कोल्ड स्टोरेज इस बात का आश्वासन नहीं देते है कि खराब होने वाली वस्तुएं भंडारण के दौरान खराब नहीं होंगी। 
हांलाकि इसमें पहले की तुलना में कुछ सुधार हुआ है लेकिन अभी भी यह आवश्यकता से कम है। देश में बहुत कम एकीकृत पैक-हाउस हैं, जो कोल्ड चेन में प्रवेश करने के लिए ताजा उपज को इकट्ठा करने और तैयार करने के लिए आवश्यक हैं। इन इकट्ठा करने वाली और पूर्वानुकूलन इकाइयों के बिना किसान राष्ट्रीय बाजार का लाभ नहीं उठा सकता है और उसे अपनी बिक्री सीमा को उपज के प्राकृतिक जीवन अवधि की सीमा तक सीमित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

First Published - September 19, 2022 | 11:07 PM IST

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