प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत में हर साल हजारों कपल IVF सेंटर्स पर जाते हैं, डॉक्टरों से पूरी सलाह लेते हैं, इलाज कराने का मन भी बना लेते हैं, लेकिन जैसे ही पेमेंट काउंटर पर पहुंचते हैं, तो बिना इलाज कराए ही बाहर निकल जाते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि उन्हें इलाज पर भरोसा नहीं है या डॉक्टर की सलाह गलत थी, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि लोन या फाइनेंसिंग की प्रक्रिया इतनी धीमी और उलझाऊ होती है कि मरीज का हौसला टूट जाता है।
एक औसत IVF साइकिल का खर्च 1.2 लाख रुपये से 1.5 लाख रुपये के बीच आता है। यह रकम इतनी बड़ी है कि देश के मध्यमवर्गीय परिवारों को इसके लिए फाइनेंस की जरूरत पड़ती ही है। इसके बावजूद, देश के बड़े-बड़े फर्टिलिटी क्लीनिकों में आज भी पेमेंट का पूरा सिस्टम सबसे ज्यादा परेशानी भरा बना हुआ है।
हाल ही में देश के 3,100 से ज्यादा वैलनेस और इलेक्टिव हेल्थकेयर क्लीनिकों पर एक बड़ा सर्वे किया गया है। CarePay के इस सर्वे में यह बात सामने आई है कि डॉक्टर से कंसल्टेशन (परामर्श) के बाद मरीज के न लौटने की सबसे बड़ी वजह उसकी इच्छा की कमी नहीं, बल्कि तुरंत पैसे का न होना है।
यह सर्वे CarePay की ओर से किया गया और इस स्टडी में IVF, डर्मेटोलॉजी, कॉस्मेटोलॉजी, डेंटल और वैलनेस सेक्टर के नामी चेन्स जैसे इंदिरा IVF, VLCC, बॉडीक्राफ्ट, ऑर्थोस्क्वायर और पार्था डेंटल को शामिल किया गया था। मकसद यह जानना था कि आसान किस्तों (EMI) की सुविधा मरीजों के फैसले को कैसे प्रभावित करती है।
सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि करीब 41% प्रीमियम क्लीनिकों में अब ज्यादातर मरीज इलाज के लिए ‘नो-कॉस्ट EMI’ की मांग करते हैं। वहीं, 89% क्लीनिकों ने माना कि क्लीनिक के अंदर ही कई फाइनेंस कंपनियों (मल्टी-लेंडर) से लोन दिलाने वाला सिस्टम होना चाहिए।
आज के समय में जब इलाज का खर्च लाखों में जाता है, तो मरीज यह मानकर चलता है कि उसे किस्तों की सुविधा मिलेगी, ठीक वैसे ही जैसे वह किसी ऐप से डॉक्टर का अपॉइंटमेंट बुक करता है।
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केयरपे के को-फाउंडर और सीईओ गौरव गुप्ता का कहना है, “मरीज इलाज के लिए इसलिए मना नहीं कर रहे हैं कि वे पूरा पैसा नहीं दे सकते, बल्कि इसलिए मना कर रहे हैं क्योंकि आज के दौर में इलाज महंगा हो चुका है और परिवारों की हर महीने की बचत उस रफ्तार से नहीं बढ़ी है। जो क्लीनिक मौके पर ही इस समस्या को सुलझा रहे हैं, उनके पास मरीज बढ़ रहे हैं।”
गौरतलब है कि भारत का वैलनेस और इलेक्टिव हेल्थकेयर मार्केट साल 2025 में 50 अरब डॉलर से अधिक का आंका गया, जिसके 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन इस बड़े बाजार में मरीजों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है और उन्हें लोन की सुविधाएं आसानी से नहीं मिलतीं।
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंस की सुविधा न होने पर 52% क्लीनिकों में 20% से ज्यादा मरीज परामर्श के बाद वापस नहीं आते। वहीं, 16% क्लीनिकों में यह ड्रॉप-ऑफ रेट (मरीजों के वापस न आने की दर) 40% से भी ऊपर है। अगर इसका एक औसत निकाला जाए, तो करीब 10 में से 6 मरीज सिर्फ पैसे की तंगी या तुरंत लोन न मिलने की वजह से डॉक्टर से मिलने के बाद भी इलाज शुरू नहीं करा पाते।
अगर सीधे आंकड़ों में समझें, तो क्लीनिक आने वाले हर 100 मरीजों में से लगभग 30 मरीज ऐसे होते हैं जो डॉक्टर की सलाह और अपनी पूरी दिलचस्पी दिखाने के बावजूद दोबारा कभी क्लीनिक की चौखट पर कदम नहीं रखते। यह एक ऐसा नुकसान है, जिसे क्लीनिक संचालक अक्सर समझ ही नहीं पाते।