प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता विफल होने की वजह से भू-राजनीतिक तनाव को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई है। इससे सोमवार को शेयर बाजार के गिरावट के साथ खुलने की आशंका है। रविवार शाम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट को सभी के लिए नहीं खोलता है तो नौ सेना द्वारा इसकी नाकेबंदी कर दी जाएगी, जिससे तनाव और भी बढ़ गया है।
बाजार के जानकारों के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म होने के बाद रुपये पर भी दबाव दिख सकता है मगर इसका असर सीमित होगा क्योंकि संघर्ष विराम टूटने का फिलहाल कोई संकेत नहीं है।
पिछले हफ्ते शेयर बाजार में जबरदस्त तेजी आई थी और सूचकांकों ने 5 साल से भी ज्यादा समय में सबसे अच्छी साप्ताहिक बढ़त दर्ज की थी। इसकी वजह यह थी कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्ध विराम से निवेशकों का भरोसा बढ़ा था और तेल की आपूर्ति में रुकावटों को लेकर चिंता कम हुई। बीते हफ्ते सेंसेक्स 5.8 फ़ीसदी और निफ्टी 5.9 फीसदी चढ़ा था जो फरवरी 2021 के बाद से सूचकांकों का सबसे मजबूत प्रदर्शन था।
विशेषज्ञों का कहना है कि बातचीत में आए ठहराव ने अनिश्चितता बढ़ा दी है, खास तौर पर कच्चे तेल की कीमतों के मामले में।
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक और मुख्य निवेश अधिकारी सौरभ मुखर्जी ने कहा कि निवेशक यह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि दोनों पक्षों के बीच कितना मतभेद है। ऐसा लगता है फिलहाल दोनों पक्ष समझौते से काफी दूर हैं। हालांकि आने वाले कुछ हफ्तों में मतभेद दूर होने की उम्मीद है।’
उन्होंने कहा कि निकट अवधि में बाजार की दिशा काफी हद तक ईंधन की कीमतों पर निर्भर करेगी। मुखर्जी ने कहा, ‘बाजार की प्रतिक्रिया काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि तेल की कीमतें किस ओर जाती हैं। अगर तेल की कीमतें 10 फीसदी और बढ़ जाती हैं तो बाजार में लगभग 2 से 3 फीसदी की गिरावट देखने को मिल सकती है।’
हालांकि बाजार के जानकारों का मानना है कि सोमवार को बाजार में भले ही गिरावट आए मगर यह गिरावट सीमित होगी क्योंकि हाल के समय में मूल्यांकन में कमी आई है और कूटनीतिक दखल से भी उम्मीदें हैं।
स्वतंत्र इक्विटी विश्लेषक अंबरीश बालिगा ने कहा, ‘निफ्टी में 2 फीसदी तक की गिरावट देखी जा सकती है लेकिन यह गिरावट सीमित हो सकती है क्योंकि शेयरों में पहले ही काफी गिरावट आ चुकी है। इसके अलावा भले ही अमेरिका-ईरान के बीच शुरुआती बातचीत उम्मीद के मुताबिक आगे न बढ़ी हो मगर विभिन्न हितधारक दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने के लिए मनाने के लिए आगे आ सकते हैं।’
भू-राजनीतिक संकेतों के अलावा निवेशक जनवरी-मार्च तिमाही नतीजों पर भी बारीकी से नजर रखेंगे जो निकट अवधि में बाजार के रुझान को आकार देने में अहम भूमिका निभा सकता है।
लिवलॉन्ग वेल्थ के संस्थापक हरिप्रसाद के. ने कहा, ‘भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद घरेलू कारक भी महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं। इस सप्ताह चौथी तिमाही के नतीजों में तेजी आएगी और बाजार का ध्यान स्पष्ट रूप से मुख्य आंकड़ों से हटकर भविष्य के अनुमान की ओर रहेगा।’
उन्होंने कहा कि मांग की स्थिति और मार्जिन पर प्रबंधन की टिप्पणी बहुत अहम होगी। उन्होंने कहा, ‘एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक की अगुआई में बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र सूचकांकों की दिशा तय करने में मुख्य भूमिका निभाते रहेंगे, वहीं वैश्विक मांग में अनिश्चितता के चलते विप्रो जैसे आईटी शेयरों पर दबाव बना रह सकता है।’
बीते शुक्रवार को सेंसेक्स 919 अंक चढ़कर 77,550 पर बंद हुआ था और निफ्टी 276 अंक की तेजी के साथ 24,051 पर बंद हुआ था।
विदेशी निवेश के प्रवाह पर भी निवेशकों की बारीक नजर रहेगी। पिछले कुछ सत्रों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की बिकवाली में कमी आई है। हालांकि इस महीने अब तक उन्होंने 48,213 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की है। शुक्रवार को एफपीआई ने 672 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 410 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका-ईरान के बीच समझौता नहीं होता है तो इसका असर वैश्विक जोखिम भावना पर पड़ सकता है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं जो रुपये के लिए एक बड़ी बुरी खबर होगी।
एक निजी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, ‘फिलहाल इस बात का कोई संकेत नहीं है कि युद्ध विराम खत्म हो गया है इसलिए रुपये पर गिरावट का दबाव सीमित ही रहना चाहिए।
फॉरेक्स ट्रेडर्स का कहना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े नए खतरों के बीच कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी भी बढ़ती हैं तो रुपये के कमजोर बने रहने की आशंका है और आने वाले समय में यह 94 से 95 प्रति डॉलर तक नीचे आ सकता है। बीते शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 92.73 पर बंद हुआ था।
वित्त वर्ष 2026 में विदेशी निवेश के बाहर जाने की वजह से रुपये में 9.85 फीसदी की गिरावट आई थी और मार्च में पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने इस मुश्किल को और बढ़ा दिया। मार्च में डॉलर के मुकाबले रुपये में 4 फीसदी से ज्यादा की नरमी आई। मार्च के आखिर में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए नियामकीय कदमों के बाद अप्रैल में अब तक रुपया 2.24 फीसदी मजबूत हुआ है।
वैश्विक बाजार में सतर्कता और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम है जिससे सरकारी बॉन्ड यील्ड में भी हल्की बढ़त दिख सकती है।
एक सरकारी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, ‘शुरुआती कारोबार में यील्ड थोड़ी बढ़ सकती है क्योंकि भू-राजनीतिक अनिश्चितता, खास तौर पर महंगे तेल ने महंगाई बढ़ने का जोखिम बढ़ा दिया है। मगर यह बढ़त सीमित होगी क्योंकि बाजार को अभी उम्मीद है कि स्थिति सुधर जाएगी।’
10 साल के बॉन्ड पर जो यील्ड मार्च के आखिर में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद 7 फीसदी के पार चली गई थी, 6.91 फीसदी पर बंद हुई।