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निचले स्तर पर भारत व अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल अंतर

Last Updated- December 11, 2022 | 3:10 PM IST

 भारत में ब्याज अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका से बड़े अंतर से पीछे है। 10 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड पर प्रतिफल इस साल जुलाई के अंत से 90 आधार अंक तक चढ़ा है, हालांकि इस अव​धि के दौरान इसमें ज्यादा बदलाव नहीं आया है। इसकी वजह से, भारत और अमेरिकी 10 वर्षीय बॉन्ड के बीच प्रतिफल अंतर 736 आधार अंक घटा है, जो वर्ष 2010 के बाद से इस संदर्भ में सबसे निचला स्तर है।
मौजूदा अंतर 518 आधार अंक के 10 वर्षीय औसत अंतर के मुकाबले करीब 142 आधार अंक, और 442.3 आधार अंक के 10 वर्षीय औसत अंतर के मुकाबले 66 आधार अंक कम है।
भारत और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल के बीच अंतर में ज्यादातर बार कमी पिछले दो साल में दर्ज की गई, क्योंकि आरबीआई ने विकसित अ​र्थव्यवस्थाओं में अपने प्रतिस्प​र्धियों के मुकाबले ज्यादा अनुकूल मौद्रिक नीति पर जोर दिया। विश्लेषकों का कहना है कि इतने कम प्रतिफल अंतर से भारत में बॉन्ड प्रतिफल में अचानक तेजी आने या भारतीय रुपये में और कमजोरी, या फिर इन दोनों का जो​खिम बढ़ता है।
सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल 
इ​क्विटीज के निदेशक एवं शोध प्रमुख (स्ट्रेटेजी ऐंड इकॉनोमिक्स) धनंजय सिन्हा का कहना है, ‘भारत के कम होते विदेशी मुद्रा भंडार, लगातार ऊंची मुद्रास्फीति, बढ़ते चालू खाता घाटा (सीएडी), और विकसित देशों द्वारा मौद्रिक सख्ती को देखते हुए मौजूदा कम प्रतिफल अंतर टिकाऊ नहीं है।’
भारत जैसे उभरते बाजारों ने पूंजी आक​र्षित करने के लिए डॉलर, यूरो, और जापानी येन जैसी कम जो​खिम वाली मौद्रिक परिसंप​त्तियों पर बेंचमार्क ब्याज दर के मुकाबले एक खास प्रतिफल अंतर मुहैया कराना होगा। यह खासकर भारत के लिए उपयुक्त है, जिसे अपने सीएडी को ध्यान में रखते हुए विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बनाए रखने की जरूरत है।
यदि प्रतिफल अंतर 10 साल के औसत पर वापस आता है तो भारत सरकार के 10 वर्षीय बॉन्ड पर प्रतिफल गुरुवार के 7.31 प्रतिशत से बढ़कर 8.73 प्रतिशत की ऊंचाई पर पहुंच सकता ​है। सिन्हा के अनुसार, आरबीआई द्वारा व्यापार घाटा घटाने और पूंजी आक​र्षित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत होगी। 
सिन्हा का कहना है, ‘चूंकि मौद्रिक गिरावट का पहले से ही ऊंचाई पर पहुंच चुकी मुद्रास्फीति पर प्रभाव पड़ेगा, इसलिए आरबीआई द्वारा घरेलू मांग सीमित करने, घरेलू बचत बढ़ाने, बाहरी पूंजी प्रवाह आक​र्षित करने, और व्यापार घाटा सीमित करने के लिए लगातार दरें बढ़ाने की जरूरत होगी’
राइट रिसर्च की प्रबंधक एवं संस्थापक सोनम श्रीवास्तव का कहना है, ‘अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दर वृद्धि अच्छी खबर नहीं है। इससे आरबीआई पर रुपये को सुर​क्षित बनाने का दबाव पड़ेगा।’
आरबीआई मुद्रास्फीति के ​खिलाफ अपनी मुहिम में दरें बढ़ाने को अमेरिकी केंद्रीय बैंक से पीछे है। फेड ने चालू कैलेंडर वर्ष शुरू होने के बाद से अपनी रीपो दर में 300 आधार अंक तक का इजाफा किया है।
वहीं आरबीआई ने इस अव​धि में इन दरों में 140 आधार अंक तक का इजाफा किया है। इससे आरबीआई और फेड की रीपो दर के बीच अंतर भी घटकर महज 215 आधार अंक का रह गया है, जो कोविड-पूर्व 450 आधार अंक के अंतर का आधे से भी कम है। वहीं भारत और अमेरिका में ब्याज दर के बीच अंतर में कमी से रुपये पर दबाव बढ़ना शुरू हुआ है। फेड द्वारा दर वृद्धि के बाद पिछले दो दिनों में भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट आई है। 

First Published - September 23, 2022 | 9:24 PM IST

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