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मुद्रास्फीति का जोखिम एशिया में सर्वाधिक, दर में रहेगी नरमी

Last Updated- December 11, 2022 | 5:43 PM IST

मॉर्गन स्टैनली के विश्लेषकों का कहा है कि भारत समेत एशियाई देशों में मुद्रास्फीति का जोखिम चरम पर पहुंच गया है और अगले कुछ महीनों में इसमें कमी आ सकती है। उनका कहना है कि बाजारों में एशियाई केंद्रीय बैंकों के अधिक सख्त रुख का असर दिख चुका है।
मॉर्गन स्टैनली में मुख्य एशियाई मामलों के अर्थशास्त्री चेतन अह्या ने एक ताजा रिपोर्ट में लिखा है, ‘वस्तुओं की घटती मांग, आपूर्ति श्रृंखला संबंधित समस्याओं में कमी और जिंस कीमतों में नरमी का मतलब है कि वस्तुगत महंगाई चरम स्तर पर पहुंच चुकी है। वैश्विक खाद्य कीमतें (जो शुरू में सीपीआई में खाद्य के बड़े भारांक को देखते हुए एशिया के लिए चिंता का कारण थीं) तेजी से नीचे आई हैं और मुद्रास्फीति दबाव में इजाफा होने से रोक रही हैं।’
मॉर्गन स्टैली का मानना है कि हालांकि सेवा क्षेत्र में मुद्रास्फीति ऊंची बनी रह सकती है, क्योंकि अर्थव्यवस्थाएं पुन: खुलने पर ही पूरा लाभ हासिल हो सकता है। लेकिन जैसे ही वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ेगी, इससे रोजगार वृद्धि भी सुस्त हो जाएगी और पारिश्रमिक में बढ़ोतरी सीमित होगी।
अह्या ने कहा, ‘भारत के लिए, ऊंचे तेल, खाद्य और प्रमुख वस्तु कीमतें मुख्य चिंता थीं, जबकि श्रम बाजार की स्थिति कुछ हद तक उदार है। इस संबंध में जिंस कीमतें गिर रही हैं और मुद्रास्फीति के लिए तेजी का
जोखिम भी घटा है। ‘
सीपीआई सूचकांक के हिसाब से मुद्रास्फीति मई 2022 में 7.04 पर थी, जो आरबीआई के 2-6 प्रतिशत की सीमा के मुकाबले अधिक है। जून में आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने वित्त वर्ष 2023 के लिए औसत मुख्य खुदरा मुद्रास्फीति 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमानजताया था, जो उसके द्वारा पूर्व में जताए गए 5.7 प्रतिशत के अनुमान से काफी अधिक था।
जहां एशियाई अर्थव्यवस्थाएं खाद्य मांग-आपूर्ति परिदृश्य का बेहतर ढंग से प्रबंधन करने में सफल रहीं और खाद्य मुद्रास्फीति दबाव दुनिया के अन्य हिस्सों के मुकाबले काफी कम है, लेकिन अह्या का मानना है कि फिर भी ऊंची वैश्विक खाद्य कीमतों से पैदा होने वाले प्रभाव कुछ हद दिखे हैं।
मॉर्गन स्टैनली का कहना है, ‘लेकिन गेहूं जैसे अनाज और उर्वरक की वैश्विक कीमतें तेजी से घटी हैं और इनमें करीब 30 प्रतिशत तक की कमी आई है, लेकिन मुद्रास्फीतिकारी दबाव में बदलाव आ रहा है।’
हालांकि बार्कलेज के विश्लेषकों का मानना है कि जून में सीपीआई करीब 7 प्रतिशत के ऊंचे स्तरों पर बनी रहेगी, क्योंकि सरकार ने इसे नियंत्रित करने के उपाय किए हैं और इनका असर दिखेगा। इसके अलावा, वैश्विक जिंस कीमतों में ताजा गिरावट से भी मदद मिल सकती है। साथ ही,  खाद्य तेल, एलपीजी और उर्वरकों समेत कई जिंसों की कीमतों में गिरावट की वजह से भी उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है।

First Published - July 8, 2022 | 12:26 AM IST

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