Equity savings funds: अप्रैल और मई के म्युचुअल फंड निवेश की तुलना एक दिलचस्प तस्वीर पेश करती है। जिन 42 कैटेगरी के लिए इनफ्लो के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें से केवल पांच कैटेगरी में ही मई के दौरान अप्रैल की तुलना में पॉजिटिव प्रतिशत बदलाव देखा गया। इनमें से दो हाइब्रिड कैटेगरी हैं, जो यह संकेत देती हैं कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक अपेक्षाकृत स्थिर उत्पादों की ओर रुख कर रहे हैं। आइए इक्विटी सेविंग्स फंड पर ध्यान दें, जो इन दोनों में से बड़ी कैटेगरी है। इस कैटेगरी में 24 स्कीमें हैं और इसका एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 49,194 करोड़ रुपये हैं।
इक्विटी सेविंग्स फंड आमतौर पर इक्विटी, आर्बिट्राज और डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश करते हैं। फोनपे के Share.Market में म्युचुअल फंड के हेड नीलेश डी नाइक कहते हैं, “इन्हें कम से कम 65 फीसदी ग्रॉस इक्विटी एक्सपोजर बनाए रखना होता है। हेजिंग के बाद, इनका नेट इक्विटी एक्सपोजर 15-40 फीसदी की रेंज में रहना चाहिए।” आर्बिट्राज वाला हिस्सा नेट इक्विटी एक्सपोजर को कम करके रिस्क घटाने में मदद करता है।
इक्विटी सेविंग्स फंड में आमतौर पर नेट इक्विटी फंड्स की तुलना में काफी कम गिरावट देखने को मिलती है। नाइक कहते हैं, “किसी फंड में गिरावट का स्तर उसके नेट इक्विटी एक्सपोजर पर निर्भर करता है।” वहीं, मीरा मनी के फाउंडर आनंद के. राठी का कहना है कि जब बाजार अच्छा प्रदर्शन करता है, तब फंड का इक्विटी हिस्सा रिटर्न बढ़ाने में योगदान देता है।
इक्विटी सेविंग्स फंड का टैक्स ट्रीटमेंट इन्हें खासकर हाई इनकम टैक्स स्लैब वाले निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बनाता है। चूंकि ये फंड अपनी कम से कम 65 फीसदी एसेट्स इक्विटी में निवेश करते हैं, इसलिए टैक्स नियमों के तहत इन्हें इक्विटी-ओरिएंटेड फंड माना जाता है।
प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन कहते हैं, “लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) तब लागू होता है जब निवेशक इन्हें एक साल से ज्यादा समय तक अपने पास रखते हैं। LTCG पर 12.5 फीसदी टैक्स लगता है। शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) तब लागू होता है जब निवेशक इन्हें एक साल तक अपने पास रखते हैं। STCG पर 20 फीसदी टैक्स लगता है।”
निवेशक इक्विटी-ओरिएंटेड फंड्स पर लागू 1.25 लाख रुपये की सालाना टैक्स-फ्री LTCG लिमिट का भी फायदा उठा सकते हैं।
इक्विटी सेविंग्स फंड निवेशकों को इक्विटी बाजार की पूरी तेजी (फुल इक्विटी अपसाइड) का लाभ नहीं दे पाते। नाइक कहते हैं, “ऐसा इसलिए है क्योंकि इन फंड्स का खुला (ओपन) इक्विटी एक्सपोजर सीमित रहता है।” वहीं, राठी का कहना है, “जब इक्विटी बाजार कमजोर प्रदर्शन करते हैं, तब ये फंड कम या यहां तक कि नेगेटिव रिटर्न भी दे सकते हैं।”
निवेशकों को इन फंड्स को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) का विकल्प नहीं मानना चाहिए। ये फंड न तो मूलधन (कैपिटल) की सुरक्षा की गारंटी देते हैं और न ही एफडी की तरह निश्चित एवं पूर्वानुमानित रिटर्न प्रदान करते हैं। इनके सीमित इक्विटी एक्सपोजर के कारण भी रिटर्न में उतार-चढ़ाव (वोलैटिलिटी) आ सकता है।
जिन निवेशकों का रिस्क प्रोफाइल रूढ़िवादी (कंजर्वेटिव) से मध्यम (मॉडरेट) है और जो अपने पोर्टफोलियो में स्थिरता चाहते हैं, लेकिन कुछ हद तक उतार-चढ़ाव सहन कर सकते हैं, वे इन फंड्स पर विचार कर सकते हैं।
ये फंड उन निवेशकों के लिए भी बेहतर हो सकते हैं जो फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) से बेहतर रिटर्न की तलाश में हैं। राठी कहते हैं, “जो निवेशक प्री-टैक्स आधार पर लगभग 8-9 फीसदी रिटर्न का लक्ष्य रखते हैं, वे इस कैटेगरी पर विचार कर सकते हैं।”
एक्सपर्ट्स के अनुसार, निवेशकों के पास कम से कम तीन साल का इन्वेस्टमेंट होराइजन होना चाहिए। राठी के मुताबिक, “जो लोग मध्यम अवधि के लिए पूंजी (कॉर्पस) तैयार कर रहे हैं या करीब तीन साल बाद घर या कार खरीदने के लिए डाउन पेमेंट की योजना बना रहे हैं, उनके लिए ये फंड एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं।”
बहुत ज्यादा रूढ़िवादी (हाईली कंजर्वेटिव) निवेशकों को इक्विटी सेविंग्स फंड से दूर रहना चाहिए। राठी कहते हैं, “जिन निवेशकों की सोच फिक्स्ड-इनकम निवेश जैसी है और जो निश्चित 6-7 फीसदी रिटर्न की उम्मीद करते हैं, वे इस कैटेगरी से निराश हो सकते हैं।” इसके अलावा, ऐसे वरिष्ठ नागरिक जो रिटर्न में उतार-चढ़ाव बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकते, उन्हें भी इन फंड्स से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
एक साल या उससे कम निवेश अवधि रखने वाले निवेशकों के लिए भी यह कैटेगरी बेहतर नहीं मानी जाती। वहीं, जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि में संपत्ति निर्माण (वेल्थ क्रिएशन) है और जिनका निवेश का नजरिया 5 से 10 साल का है, वे अन्य निवेश उत्पादों में इससे बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।
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पिछले कुछ वर्षों के दौरान इक्विटी हिस्से से कोई खास रिटर्न नहीं मिला है। राठी कहते हैं, “इस वजह से फिक्स्ड-इनकम और आर्बिट्राज हिस्सों से मिलने वाले रिटर्न पर भी दबाव पड़ा है।”
हालांकि, जिन निवेशकों का निवेश का नजरिया कम से कम तीन साल का है, वे इस समय निवेश पर विचार कर सकते हैं। राठी के अनुसार, “आने वाले समय में इक्विटी बाजार का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है और अगले दो से तीन साल में फंड का इक्विटी हिस्सा रिटर्न बढ़ाने का काम कर सकता है।”
निवेशकों को किसी फंड का चयन केवल उसके पिछले एक साल के रिटर्न के आधार पर नहीं करना चाहिए। धवन कहते हैं, “फंड के प्रदर्शन की विभिन्न अवधियों में निरंतरता (कंसिस्टेंसी) का आकलन करने के लिए निवेशकों को रोलिंग रिटर्न का उपयोग करना चाहिए।”
फंड चुनते समय निवेशकों को उसके प्रदर्शन की तुलना उसके बेंचमार्क और कैटेगरी के औसत प्रदर्शन से भी करनी चाहिए। धवन के अनुसार, “निवेशकों को शार्प रेशियो जैसे रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न संकेतकों की भी जांच करनी चाहिए।”
इस तरह फंड का चयन केवल रिटर्न के आधार पर नहीं, बल्कि उसके जोखिम और विभिन्न बाजार परिस्थितियों में प्रदर्शन की स्थिरता को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
निवेशकों को सबसे पहले फंड में इक्विटी का वास्तविक आवंटन देखना चाहिए। धवन कहते हैं, “ज्यादा इक्विटी एक्सपोजर बाजार में तेजी के दौरान रिटर्न बढ़ा सकता है, लेकिन बाजार के कमजोर प्रदर्शन की स्थिति में यह रिटर्न को नुकसान भी पहुंचा सकता है।”
निवेशकों को फंड के मार्केट-कैप आवंटन पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि किसी फंड में मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों का हिस्सा ज्यादा है, तो निवेश का समय लंबा होना चाहिए, क्योंकि ऐसे निवेशों में गिरावट का जोखिम भी ज्यादा होता है।
इसके अलावा, फंड के इक्विटी पोर्टफोलियो में सेक्टोरल होल्डिंग्स की भी जांच करनी चाहिए। धवन के अनुसार, “यदि कोई फंड अपने बेंचमार्क की तुलना में किसी विशेष सेक्टर में ज्यादा निवेश (ओवरवेट) रखता है, तो उस सेक्टर के अच्छा प्रदर्शन करने पर फंड बेहतर रिटर्न दे सकता है। वहीं, सेक्टर के कमजोर प्रदर्शन की स्थिति में फंड का प्रदर्शन भी प्रभावित हो सकता है।”
इन फंड्स में निवेश करने वाले कई निवेशक हाई क्रेडिट रिस्क नहीं लेना चाहते। धवन कहते हैं, “फंड के डेट पोर्टफोलियो की क्रेडिट क्वालिटी की जांच करें और ऐसे फंड को प्राथमिकता दें, जो हाई क्वालिटी वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता हो।”
कई निवेशक हाई ड्यूरेशन रिस्क लेने के लिए भी तैयार नहीं होते। इसलिए फंड के पोर्टफोलियो की मॉडिफाइड ड्यूरेशन भी देखनी चाहिए। मॉडिफाइड ड्यूरेशन यह बताती है कि ब्याज दरों में बदलाव होने पर डेट पोर्टफोलियो की कीमत कितनी संवेदनशील हो सकती है।
धवन के अनुसार, “क्रेडिट क्वालिटी और मॉडिफाइड ड्यूरेशन की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि ये दोनों फैक्टर फंड के जोखिम और रिटर्न प्रोफाइल को प्रभावित करते हैं।”
निवेशकों को फंड का चयन करते समय एक्सपेंस रेशियो की तुलना जरूर करनी चाहिए। इससे यह पता चलता है कि क्या समान रिटर्न किसी अन्य फंड से कम लागत पर हासिल किया जा सकता है।
इसके अलावा, पोर्टफोलियो टर्नओवर पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसका असर फंड की कुल लागत पर पड़ता है। ज्यादा टर्नओवर का मतलब अक्सर ज्यादा खरीद-बिक्री गतिविधि और संभावित रूप से ज्यादा खर्च हो सकता है।
बड़ा फंड साइज फायदेमंद हो सकता है। धवन के अनुसार, “बड़ा फंड साइज स्वीकार्य हो सकता है। ऐसे फंड आमतौर पर बेहतर एक्सपेंस-रेशियो एफिशिएंसी प्रदान कर सकते हैं और उन्हें फंड हाउस का ज्यादा ध्यान भी मिलता है।”
निवेशकों को यह भी जांचना चाहिए कि फंड का निवेश कुछ चुनिंदा शेयरों या सेक्टरों में कितना केंद्रित (कंसन्ट्रेटेड) है। धवन कहते हैं, “यदि फंड कुछ चुनिंदा शेयरों में अधिक निवेश रखता है, तो उनके अच्छा प्रदर्शन करने पर रिटर्न बढ़ सकता है। लेकिन यदि वे शेयर कमजोर प्रदर्शन करते हैं, तो फंड का प्रदर्शन भी अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकता है।”
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मौजूदा निवेशकों को सबसे पहले यह दोबारा आकलन करना चाहिए कि उन्होंने इस कैटेगरी में निवेश क्यों किया था। धवन कहते हैं, “यदि निवेश का उद्देश्य दो से तीन वर्ष दूर किसी वित्तीय लक्ष्य को पूरा करना था, तो केवल एक वर्ष के कमजोर रिटर्न के आधार पर निवेश रणनीति बदलने की आवश्यकता नहीं है।”
निवेशकों को निवेश जारी रखना चाहिए, यदि:
हालांकि, जिन निवेशकों को बहुत जल्द धन की आवश्यकता पड़ने वाली है, उनके लिए लिक्विड फंड या आर्बिट्राज फंड ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि केवल फंड के कमजोर प्रदर्शन के कारण सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) बंद नहीं करना चाहिए। SIP तभी बंद करने पर विचार करना चाहिए, जब निवेशक का वित्तीय लक्ष्य बदल गया हो या उसे तत्काल धन की जरूरत हो।
नए निवेशकों को यह समझना चाहिए कि इक्विटी सेविंग्स फंड में कुछ हिस्सा बिना हेज (अनहेज्ड) किए गए इक्विटी निवेश का भी होता है। धवन कहते हैं, “निवेशकों को इस कैटेगरी में निवेश करने से पहले कुछ हद तक उतार-चढ़ाव (वोलैटिलिटी) के लिए तैयार रहना चाहिए।”
इन फंड्स में निवेश का अनुपात निवेशक की जोखिम उठाने की क्षमता (रिस्क टॉलरेंस) और वित्तीय लक्ष्यों पर निर्भर करता है। धवन के अनुसार, अधिकांश निवेशक अपने कुल पोर्टफोलियो का 10 से 20 फीसदी हिस्सा इस कैटेगरी में आवंटित करने पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, निवेशकों के पास कम से कम तीन साल का निवेश नजरिया होना चाहिए, ताकि बिना हेज वाले इक्विटी हिस्से से उत्पन्न जोखिम को बेहतर ढंग से संभाला जा सके।
धवन कहते हैं, “एसआईपी (SIP), एसडब्ल्यूपी (SWP) और सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान (STP) जैसी चरणबद्ध निवेश रणनीतियां इन फंड्स में जोखिम को और बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं।”